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चीन से होड़ कर पाएंगे ट्रंप

Thu, 24 Nov 2016 06:59 PM IST
एडुआर्डो पोर्टर
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डोनाल्ड ट्रंप
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चीन के साथ व्यापार को लेकर छिड़ी जंग में कौन जीतेगा? पेरू में हुए एशिया पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन सम्मेलन में सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या अमेरिका के अगले राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप बीजिंग के खिलाफ कठोर व्यापार बाधाएं (कर) लगाने की अपनी धमकी पर अमल करते हुए अमेरिका को दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ जैसे को तैसा वाले टकराव में तो नहीं झोंक देंगे। हालांकि अभी ऐसी कोई जंग शुरू नहीं हुई है, लेकिन ऐसा लगता है कि अमेरिका बाजी हार चुका है। वहीं चीन धीरे-धीरे वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बढ़त बना रहा है।
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वैश्वीकरण के खिलाफ जंग छेड़कर अमेरिका चीन के पक्ष को ही मजबूत कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में चीनी विभाग के पूर्व प्रमुख ईश्वर प्रसाद तर्क देते हैं, 'चाहे कुछ भी हो जाए दीर्घकाल में चीन विजेता के रूप में उभरेगा।' यदि अमेरिका पांच सौ अरब डॉलर के चीनी आयात पर 45 फीसदी का कर थोपता है, तो निश्चित ही चीन की अर्थव्यवस्था को नुक्सान पहुंचेगा। चीन के कुल निर्यात के सिर्फ सोलह फीसदी की ही अमेरिका में खपत है, मगर वह चीन का सबसे मजबूत निर्यात बाजार है। अमेरिकी संरक्षणवादियों की चिंता की वजह से चीन से पूंजी का पलायन शुरू भी हो चुका है। मगर इस झटके से उबरने में चीन अमेरिका की तुलना में कहीं बेहतर तैयारी में है। अमेरिका की इस कार्रवाई के जवाब में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा, 'बोइंग विमानों के सौदे को एयरबस से बदला जा सकता है। चीन में अमेरिकी वाहनों और आईफोन की बिक्री को झटका लगेगा और अमेरिका से सोयाबीन और मक्के का आयात रोक दिया जाएगा।'

चीन के पास जवाबी कार्रवाई के कई रास्ते हैं। वह राज्य के मालिकाना हक वाली कंपनियों को अमेरिकी कारोबारियों के साथ व्यापार करने से रोक सकता है। वह आवश्यक जिंसों तक पहुंच रोक सकता है, जैसा कि उसने जापान के साथ मछुआरों से संबंधित विवाद के समय इलेक्ट्रॉनिक उद्योग के लिए जरूरी कथित दुर्लभ खनिजों का आयात रोक दिया था। वह अमेरिकी पेटेंट और कॉपीराइट की नकल के खिलाफ कार्रवाई में ढील दे सकता है।
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इस टकराव से अमेरिका की कुछ अत्यंत सफल कंपनियों के लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। उदाहरण के लिए ऐपल कंपनी के आईफोन की एसेंबलिंग का बड़ा काम चीन में होता है। इसका मतलब है कि चीन बहुत कम नुकसान के साथ आईफोन का उत्पादन रोक सकता है, जबकि इससे ऐपल को भारी मुश्किलें आ सकती हैं, क्योंकि उसे अपना उत्पादन कहीं और ले जाना महंगा पड़ेगा। अमेरिका में शून्य से इसका उत्पादन शुरू करना तो लगभग असंभव ही है।

व्यापार समर्थक पीटर्सन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स का विश्लेषण है कि चीन और मैक्सिको के साथ यदि कारोबार संबंधी जंग छिड़ जाती है तो अमेरिका में 2020 तक बेरोजगारी की दर नौ फीसदी हो जाएगी, जोकि अभी 4.9 फीसदी है। यह उन लाखों कामकाजी अमेरिकियों की आर्थिक स्थिति के लिहाज से ठीक नहीं होगा, जिनकी लड़ाई लड़ने का ट्रंप ने दावा किया। और यह सब उतना बदतर न भी हो। चीन साझा हितों के साथ अमेरिका के खिलाफ गोलबंदी भी कर सकता है। इस लड़ाई में वाशिंगटन को खलनायक साबित करने का प्रयास होगा। अमेरिकी हितों को नुक्सान पहुंचाने के लिए चीन चाहे कितनी भी तिकड़मे करे, कई देशों की नजरों में वह पीड़ित ही होगा और उसे खुले नियम आधारित व्यापार के पैरोकार के तौर पर देखा जाएगा। यदि ट्रंप, जैसा कि उनके सहयोगियों का कहना है कि सिर्फ धौंस जमा रहे हैं, ताकि भविष्य की वार्ताओं में कुछ बढ़त हासिल कर सकें, तो भी नुकसान तो हो चुका है। उनकी शेखी ने भविष्य में वैश्विक पटल पर अमेरिका की भूमिका से संबंधित धारणाओं को प्रभावित किया है।

ब्रिटेन और फ्रांस जैसे दूसरे अमीर देशों में राष्ट्रवाद की बढ़ती लोकप्रियता के बीच चीन वैश्विक पूंजीवाद के अनचाहे समर्थक के रूप में उभरा है। पीटर्सन इंस्टीट्यूट की चीन संबंधी मामलों के विशेषज्ञ निकोलस लार्डी कहते हैं कि चीन ऐसी बड़ी ताकत है, जो अब भी एकीकरण बढ़ाने की बात कर रहा है। चीन दुनिया का अकेला ऐसा बड़ा देश है, जो इस विचार को बढ़ावा दे रहा है कि वैश्वीकरण से लाभ होता है और यह अमेरिका का नुकसान है।

विकसित दुनिया के अनेक देश अब भी यह मानते हैं कि उनकी समृद्धि वैश्विक अर्थव्यवस्था की सप्लाई चेन के साथ उनके सफलतापूर्ण एकीकरण पर निर्भर है। ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) से हटने की घोषणा करने के बाद अमेरिका के हाथ में कुछ रह नहीं गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के कुछ समय बाद ऑस्ट्रेलिया के व्यापार मंत्री स्टीवन सिओबो ने कहा था कि उनका देश क्षेत्रीय समग्र आर्थिक साझेदारी की स्थापना के लिए काम करेगा (यह चीन की पहल है, जिसमें एशिया प्रशांत क्षेत्र के 16 देश शामिल हैं, जिसमें अमेरिका नहीं है) और एशिया प्रशांत क्षेत्र में मुक्त व्यापार के चीन के प्रस्ताव का समर्थन करेगा। पेरू और चिली में भी यही बात हुई। ईश्वर प्रसाद कहते हैं कि एशियाई क्षेत्र की प्रत्येक अर्थव्यवस्था यह देख रही है कि चीन के साथ करीबी रखने में अपना भविष्य देख रही है। यदि ट्रंप व्यापार सौदों को वापस लेने की बात करेंगे, तो एशियाई देशों के लिए खुद को चीन के नजदीक जाने से रोकना मुश्किल होगा। यदि वाशिंगटन की चीन के खिलाफ कार्रवाई से एशिया की सप्लाई चेन को नुकसान पहुंचता है, तो अमेरका इस क्षेत्र में आर्थिक रूप से अलग -थलग पड़ सकता है।
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