राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका इन दिनों 'शटडाउन' से बेहाल है। सरकारी कामकाज ठप है। उन्होंने मैक्सिको सीमा पर दीवार के निर्माण की जिद पर शटडाउन कर रखा है। जिद न छोड़ने की वजह से वह खुद भी परेशान हैं। दरअसल जब से ट्रंप ने राष्ट्रपति का पद संभाला है, उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए हैं, जो अमेरिकी जनता के गले आसानी से नहीं उतर रहे हैं। इनमें से बहुत से ऐसे फैसलों की निंदा हो रही है और दो फैसले तो सख्त नुक्ताचीनी के शिकार हैं। जैसे अफगानिस्तान में तैनात 14,000 नाटो व अमेरिकी फौज को अगले छह महीने में वहां से वापस बुलवाना और अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए पाकिस्तान से मदद की अपील करना। यानी पाकिस्तान न केवल तालिबान को बातचीत की मेज पर बिठाए, बल्कि अफगान सरकार से सीधी बातचीत के लिए राजी करे और ऐसा राजनीतिक समझौता तय करने में मदद भी करे, जिसके तहत अफगानिस्तान में जारी जंग बंद हो जाए। अमेरिकी फौज वापस चली जाए, साथ ही अफगानिस्तान में अमेरिका के हित भी सुरक्षित रहें।
ट्रंप मंत्रिमंडल के कुछ वरिष्ठ सदस्य इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। रक्षा सचिव जैम्स मैटिस तो इस फैसले से इस कदर नाखुश हुए कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया। पूर्व अमेरिकी कमांडर मिक कार्सल ने कहा है कि अफगानिस्तान से आधी संख्या में सैनिक वापस बुलाने के फैसले से तालिबान को 17 साल जंग के बाद हुई शांति बहाली में फायदा पहुंचेगा। इससे अफगान अवाम का अमेरिका और उसके गठबंधन में शामिल नाटो देशों पर से भरोसा भी खत्म हो जाएगा। यह भी माना जा रहा है कि इससे पश्चिम व दक्षिण एशिया प्रभावित होगा, क्योंकि अफगानिस्तान में भारत के हित जुड़े हुए हैं। इससे भारत सरकार का चिंतित होना स्वाभाविक है। ट्रंप का यह रवैया तालिबानी दुस्साहस को भी बढ़ाएगा।
तालिबान का कहना है कि उस वक्त तक किसी भी मसले पर सहमति नहीं जताएंगे, जब तक अफगानिस्तान से पूरी अमेरिकी-नाटो फौज निकल नहीं जाती, कैदियों के तबादले और तालिबान नेताओं के आने-जाने पर लगी पाबंदी हटाई नहीं जाती। दूसरी तरफ अमेरिका ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए अपना खास दूत जलमय खलीलजाद नियुक्त कर तालिबान से वार्ता करने की जिम्मेदारी सौंपी है, ताकि तालिबान हिंसा छोड़कर अफगान सरकार से सीधी बातचीत शुरू करें। तीन दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन खलीलजाद अभी तक तालिबान को इसके लिए राजी नहीं कर पाए।
ऐसा नजर आता है कि ट्रंप दोस्त-दुश्मन की पहचान नहीं कर पा रहे हैं। आम ख्याल यह है कि पाकिस्तान अमेरिकी फौज के अफगानिस्तान से निकल जाने के बाद तालिबान की ऐसी सरकार कायम कराना चाहता है, जो उसकी कठपुतली बनी रहे। पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत की किसी सूरत में मौजूदगी भी नहीं चाहता।
इसमें कोई शक नहीं कि 2001 में जब अमेरिका ने अपने गठबंधन में शामिल सहयोगी देशों के साथ अफगानिस्तान पर बमबारी की थी, तो लगा था कि तालिबान सरकार के साथ तालिबान भी नेस्तनाबूद हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अमेरिका जंग की दलदल में फंसता चला गया।
यह जंग वियतनाम की जंग के बाद अमेरिका के इतिहास की सबसे लंबी जंग साबित हो रही है। अमेरिकी हितों की पूर्ति के लिए ट्रंप ने अपने फैसलों के लिए जो समय चुना है, वह उचित नहीं है। उम्मीद की जा रही है कि ट्रंप इन फैसलों पर फिर से विचार करेंगे, वरना जिस मकसद के लिए जंग शुरू की थी, वह पूरा नहीं हो पाएगा।