जाधवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कनक सरकार की समस्या क्या है? उनका मानना है कि उन्हीं लड़कियों से शादी करनी चाहिए, जो कुंवारी हों। इस संदर्भ में ‘सीलबंद बोतल’ जैसे शब्द का प्रयोग करते हुए भी उन्हें हिचक नहीं हुई। फेसबुक पर लड़कियों-महिलाओं के बारे में कनक सरकार की ऐसी पोस्ट पढ़कर छात्र-छात्राओं में क्षोभ फैल गया। उन्हें प्राध्यापक के पद से हटा दिया गया है। अगर व्यापक विरोध न होता, तो कनक सरकार जिस तरह नौकरी कर रहे थे, उसी तरह कर रहे होते। तब फेसबुक पर लड़कियों के खिलाफ अपनी इस मानसिकता का वह लगातार परिचय दे रहे होते। जाधवपुर विश्वविद्यालय के छात्र अन्याय का विरोध करने के मामले में मुखर रहते हैं। यह विरोध बहुत जरूरी है।
अलबत्ता कनक सरकार ने फेसबुक पर जो लिखा, हमारे समाज के ज्यादातर स्त्री-पुरुष उस पर विश्वास करते हैं। कनक सरकार ने डिग्री हासिल करने के लिए कॉलेज, और फिर विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। उसके बाद कॉलेज और विश्वविद्यालय में पढ़ाने की योग्यता उन्होंने हासिल की। लेकिन वह वास्तविक अर्थ में शिक्षित नहीं हुए। किताब याद कर परीक्षा पास कर लेना एक बात है, शिक्षित होना दूसरी बात। अगर वह सचमुच शिक्षित होते, तो लड़कियों के बारे में ऐसी टिप्पणियां कतई नहीं करते, जिसके लिए वह बहुतेरे लोगों के निशाने पर हैं। अंग्रेजी के बेहद लोकप्रिय लेखक ने भी एक बार लड़कियों की वेंडिंग मशीन से तुलना की थी, जिसकी काफी आलोचना हुई थी। विरोध के बाद कनक सरकार को जिस तरह अपनी फेसबुक पोस्ट डिलीट करनी पड़ी, ठीक उसी तरह उस लेखक को भी अपना ट्वीट हटाने के लिए विवश होना पड़ा था।
साहित्य की दुनिया में, कॉलेज और विश्वविद्यालयों में, राजनीति में इतने अशिक्षित लोग भरे पड़े हैं कि मैं कई बार हताश हो जाती हूं। हमारे समाज की पहचान यही है। विज्ञान की पढ़ाई करने वाले बहुतेरे डॉक्टर और इंजीनियर वैज्ञानिक चेतना संपन्न नहीं हो पाते। यह उनकी सीमा है। यह सब देखकर ऐसा लगता है कि आजकल की पढ़ाई सिर्फ परीक्षा पास कर अच्छी नौकरी प्राप्त कर लेने तक सीमित हो गई है। अगर शिक्षक-प्राध्यापक ही अशिक्षित हों, तो नई पीढ़ी को कौन शिक्षित करेगा? लड़कियों में मस्तिष्क और स्नायु तंत्र है, शरीर, दिल, बोध, अनुभूति, चिंता, चेतना, युक्ति और बुद्धि से युक्त लड़कियां मनुष्य ही हैं, यह न समझ पाने का मतलब तो अशिक्षित रह जाना ही है।
असम के सिलचर में बांग्ला कवि श्रीजात पर पिछले दिनों हमला हुआ। पुलिस के कारण ही वह उस दिन वहां से सुरक्षित निकल पाए। उसके बाद उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में कहा कि यह जरूरी है। इस मुद्दे पर मैं उनके साथ हूं। लेकिन सवाल यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दम भरने वाले श्रीजात क्या दूसरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खड़े होते हैं। उनके राज्य पश्चिम बंगाल से जब मुझे निर्वासित किया जा रहा था, तब श्रीजात ही क्यों, अभिव्यक्ति की आजादी की बात करने वाले किसी भी व्यक्ति ने मुंह नहीं खोला था। मुझे पता चला कि उसी दौरान श्रीजात ने कहीं मेरे बारे में यह कहा था कि मुझे कोलकाता में जाना ही नहीं चाहिए। विगत नवंबर में टाइम्स लिटरेरी फेस्टिवल की तरफ से कोलकाता के उनके आयोजन में मुझे आमंत्रित किया गया था। शायद आयोजकों ने यह समझ लिया था कि माकपा तो वर्षों से पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर है, लिहाजा नई सरकार ने पुरानी सरकार की गलती सुधार ली होगी। लेकिन बाद में उन्हें सच्चाई पता चली, तो उन्होंने मुझे बेहद खामोशी से यह सूचना दी कि कोलकाता में मुझे बुलाना उनके लिए संभव नहीं है।
बहुत लोगों का मानना है कि चूंकि मैं मुस्लिम कट्टरपंथ का विरोध करती हूं, चूंकि मुस्लिम कट्टरपंथियों ने पिछले पच्चीस साल से मुझे निशाना बना रखा है, इसलिए भाजपा मेरा समर्थन करती है, क्योंकि वह भी मुस्लिम कट्टरपंथ की विरोधी है। लेकिन भाजपा समर्थक लोग भी सोशल मीडिया पर मुझ पर निरंतर विषवमन करते रहते हैं, क्योंकि मैं नास्तिक हूं। महिलाओं के अधिकारों के लिए मुखर रहने के कारण भी मैं ऐसे लोगों के निशाने पर रहती हूं।
मेरे ऊपर हमला होने पर, मुझे पश्चिम बंगाल से क्यों, भारत से भगाए जाने की साजिश होने पर भी कोलकाता नाम के उस प्रगतिशील शहर में विरोध क्यों नहीं होता, यह मैं आज तक समझ नहीं पाई हूं। जबकि इसी कोलकाता शहर में बसने की आकांक्षा लिए मैं कभी यूरोप छोड़कर आ गई थी। मुझे लगता है, कोलकाता के कुछ मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर दूसरे लोग यह मानते हैं कि चूंकि मैं भारतीय नहीं हूं, इसलिए मुझे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जरूरत नहीं है। वे यह भी कहते होंगे कि मुझे कोलकाता में रहने की जिद ही क्यों पालनी चाहिए? क्या मैं कोलकाता में पैदा हुई हूं? नास्तिक होने के बावजूद उनकी नजरों में मैं मुसलमान हूं। सरकारी दस्तावेजों में रेजिडेंट का स्टेटस होने के बावजूद उनके लिए मैं रिफ्यूजी यानी शरणार्थी हूं। स्वीडन की नागरिकता के बावजूद उनके लिए मैं बांग्लादेश जैसे एक तुच्छ देश की हूं। अपने खर्च पर रहने और सालोंसाल टैक्स अदा करने के बाद भी उनके मुताबिक मैं अतिथि हूं। इसलिए मुझे भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। कोलकाता से भगा दिया गया, तो क्या हुआ, इस देश में तो मुझे शरण मिली है। फिर मुझे हर बात पर बोलना क्यों चाहिए? हां, अगर मैं गोरी होती, मैं ईसाई होती, मेरी भाषा अंग्रेजी होती, मेरी किताबें अंग्रेजी में छपतीं, मेरा घर यूरोप में होता, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मेरी मांग के समर्थन में प्रगतिशील शहरों में जुलूस निकलते, बुद्धिजीवी मेरे हक में बोलते। श्रीजात के साथ ऐसा क्या बुरा हुआ है? मेरे साथ इससे भी बुरा हुआ है। इस पर शायद कोई कहे, लेकिन तुम तो विदेशी हो। ब्रह्मपुत्र के एक ही तट पर पैदा होने के बावजूद मैं विदेशी हूं! असल में मेरी बात पसंद न आते ही मुझ पर विदेशी होने का तमगा लगा दिया जाता है। कोलकाता का समाज गर्व से कहता है, 'विदेशियों की समस्या पर हम विचार नहीं करते। हम प्रगतिशील हैं, हम बंगाली बुद्धिजीवी हैं।' क्या बात है!