मुनीर की डोनाल्ड ट्रंप के साथ लंच मीटिंग ऐतिहासिक रही, क्योंकि यह पहली बार था, जब किसी कार्यरत पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष को इस स्तर पर आमंत्रित किया गया। पहले ऐसे सम्मान केवल उन सैन्य नेताओं को मिले थे, जो सत्ता में भी आ चुके थे। इसके बाद वायुसेना प्रमुख सिद्दू की यात्रा संकेत देती है कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान वाशिंगटन के साथ अपने पुराने रिश्तों को पुनर्जीवित करने के लिए सुनियोजित रणनीति के तहत काम कर रहा है। यह ठीक उसी समय हो रहा है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच पहलगाम आतंकी हमले के बाद तनाव तेजी से बढ़ रहा है।
इसके पीछे एक प्रमुख कारण पाकिस्तान की चीनी हथियार प्रणालियों के प्रदर्शन को लेकर बढ़ती असंतुष्टि है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारतीय मिसाइलों और ड्रोन ने पाकिस्तान की एचक्यू-9पी और एचक्यू-16 वायु रक्षा प्रणालियों को नष्ट करके उनकी सीमाएं उजागर कर दीं। इसने पाकिस्तान को पश्चिमी रक्षा तकनीक की ओर रुख करने और अमेरिका से एफ-16 ब्लॉक 70 लड़ाकू विमान, एआईएम-7 स्पैरो मिसाइलें, एचआईएमएआरएस रॉकेट सिस्टम और आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियों जैसी उन्नत सैन्य मदद मांगने को प्रेरित किया। वाशिंगटन में सिद्दू की बैठकें संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण, प्रौद्योगिकी साझाकरण और रक्षा सहयोग को मजबूत करने पर केंद्रित थीं। हालांकि, सतही तौर पर यह सब कुछ सामान्य कूटनीतिक गतिविधि प्रतीत हो सकती है, लेकिन इनके पीछे दोनों पक्षों की गहरी रणनीतिक सोच छिपी है।
अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ अक्सर व्यावहारिक संबंध रखे हैं-जब-जब ऑपरेशनल जरूरतें पड़ीं, वाशिंगटन ने इस्लामाबाद से संबंध मजबूत किए। शीतयुद्ध, 9/11 के बाद की आतंकवाद विरोधी लड़ाइयों, और अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के दौरान यह पैटर्न स्पष्ट रूप से दिखा।
अब ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच, अमेरिका फिर से पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति, रसद सुविधाओं और खुफिया नेटवर्क के कारण उसकी ओर देख रहा है। मुनीर के साथ ट्रंप की ईरान पर चर्चा और एक संभावित रणनीतिक पैकेज की खबर (जिसमें पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान, आर्थिक मदद और व्यापारिक समझौते शामिल हैं) इस रिश्ते के पुनरुद्धार का संकेत देती है। भारत के लिए अमेरिका और पाकिस्तान के बीच यह बढ़ती नजदीकी कई चुनौतियां उत्पन्न कर सकती है। सबसे पहली चिंता यह है कि इससे भारत और अमेरिका के बीच पिछले दो दशकों में विकसित हुई विशेष रणनीतिक साझेदारी को आघात पहुंच सकता है। यह एक ऐसा संबंध है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों, रक्षा सहयोग और हिंद-प्रशांत रणनीति पर आधारित रहा है। जब भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर वाशिंगटन में थे, उसी समय अमेरिका द्वारा पाकिस्तान के सैन्य प्रमुखों की मेजबानी करना उसकी प्राथमिकताओं को लेकर भ्रम पैदा करता है।
दूसरा, अगर पाकिस्तान को अमेरिका से नई सैन्य क्षमताएं मिलती हैं, तो यह उसे कश्मीर या नियंत्रण रेखा पर अधिक आक्रामक रुख अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है-खासकर तब, जब पाकिस्तान की सैन्य मदद का अतीत आतंकी नेटवर्कों को समर्थन देने से जुड़ा रहा हो।
तीसरी चिंता यह है कि अमेरिका के साथ पुन: संपर्क पाकिस्तान की उस दोहरी कूटनीति को वैधता दे सकता है, जिसमें वह चीन और अमेरिका, दोनों से नजदीकी रखकर रणनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करता रहा है। इन सबके बीच ट्रंप का यह दावा कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम करवाया, और इसके लिए व्यापारिक प्रलोभनों और राजनयिक दबाव का उपयोग किया, भारत के लिए विशेष चिंता का विषय है। भारत ने स्पष्ट रूप से तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को नकारते हुए कहा है कि कश्मीर पूरी तरह से एक द्विपक्षीय मुद्दा है। ऐसे बयानों से न केवल कूटनीतिक तनाव बढ़ता है, बल्कि यह भारत की संप्रभुता को भी चुनौती देता प्रतीत होता है।
अमेरिका की पाकिस्तान की ओर बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता को केवल दक्षिण एशिया के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि ईरान से जुड़ी पश्चिम एशियाई रणनीति के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। अगर अमेरिका और इस्राइल ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की ओर बढ़ते हैं, तो इस्लामी दुनिया में अमेरिका की छवि बनाए रखने के लिए पाकिस्तान की भूमिका अहम हो सकती है। उसकी इस्लामी पहचान, खाड़ी देशों के साथ पुराने संबंध और रणनीतिक स्थिति उसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनाते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में ट्रंप की पाकिस्तान के प्रति यह अचानक रुचि कोई भावनात्मक पहल नहीं, बल्कि कठोर भू-राजनीतिक सोच का परिणाम है। यह अमेरिका की उस पुरानी नीति को दर्शाता है, जिसमें पाकिस्तान को जरूरत पड़ने पर गले लगाया जाता है, भले ही इससे भारत जैसे साझेदार नाराज हो जाएं। दक्षिण एशिया को अमेरिका अक्सर वैश्विक प्राथमिकताओं (जैसे अफगानिस्तान या ईरान) को साधने का माध्यम मानता रहा है।
भारत को इस घटनाक्रम से सबक लेना चाहिए। उसे वाशिंगटन में अपनी राजनयिक सक्रियता बढ़ानी चाहिए और यह दोहराना चाहिए कि वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक भरोसेमंद, नियम-आधारित और सक्षम भागीदार है। साथ ही, उसे अपने पड़ोस में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार रहना होगा, जहां पाकिस्तान (जो अब बीजिंग और संभवतः वाशिंगटन, दोनों से समर्थन पा सकता है) एक बार फिर खुद को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा। यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि दक्षिण एशिया में वैश्विक शक्ति राजनीति के पुराने पैटर्न, अक्सर अप्रत्याशित समय पर, फिर से उभर आते हैं। भारत को इस रणनीतिक बदलाव के लिए स्पष्टता, सतर्कता और दृढ़ता के साथ तैयारी करनी होगी।