भारत के हिंदुत्ववादी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आंख मूंदकर समर्थन करते हैं। ट्वीटर पर जब-जब मैंने ट्रंप की नीतियों की आलोचना की है, तब-तब ट्रंप समर्थक ऐसे लोगों ने मुझे खूब गालियां दी हैं। ट्रंप गरीब-विरोधी, निःशक्तजन-विरोधी, अश्वेत-विरोधी, महिला-विरोधी और शरणार्थी-विरोधी हैं। इसके बावजूद भारत के हिंदुत्ववादी अगर ट्रंप की प्रशंसा करते हैं, तो सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि वह मुस्लिम-विरोधी हैं।
सच्चाई यह है भी कि अमेरिका में जो लोग मुस्लिमों को देखना नहीं चाहते, उन्हीं के वोटों से ट्रंप को जीत हासिल हुई है। अमेरिका और अमेरिका के बाहर ट्रंप के समर्थक इस इंतजार में बैठे हैं कि वह मुस्लिमों के खिलाफ कब कार्रवाई करेंगे। ट्रंप के अमेरिकी समर्थकों ने अब तक कितने मुस्लिमों को ठिकाने लगाया है, इस बारे में तो नहीं मालूम। लेकिन ट्रंप के आने के बाद से वहां दो भारतीयों-श्रीनिवास कुचिभोतला और हर्निश पटेल की हत्या हुई है और एक तीसरे दीप राय को हाल ही में निशाना बनाया गया है।
इस बीच एक बार कम रेस्तरां में एक और भारतीय आलोक मदसानी को भी गोली मारी गई थी, लेकिन संयोग से वह बच गए। जिस अमेरिकी ने उन्हें गोली मारने की कोशिश की थी, उसका नाम एडम प्यूरिंटन था। एडम की मानसिक स्थिति ठीक न देखकर रेस्तरां के मालिक ने उन्हें बाहर निकाल दिया था। लेकिन वह दोबारा बंदूक लेकर आए और भारतीयों पर गोली चलाने की कोशिश की। उसने भारतीयों के बारे में जिस तरह की टिप्पणियां कीं, वे यह बताने के लिए काफी हैं कि डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका किस तरह से घनघोर नस्लवादी बन रहा है। संसद में अपने पहले भाषण में ट्रंप ने नस्लवादी हिंसा के खिलाफ टिप्पणी तो की, लेकिन बगैर कठोर कानून के सिर्फ निंदा कर देने भर से उनके समर्थकों का हिंसक अभियान थम जाएगा, इस पर विश्वास करने का कोई ठोस कारण नहीं है।
इन लगातार हो रही घटनाओं के बाद से अमेरिका में रह रहे भारतीय समुदाय के लोग काफी भयभीत हैं। डोनाल्ड ट्रंप के जीतने के बाद वहां रह रहे मुसलमान तो भयभीत थे ही। लेकिन अब वहां भारतीय लोग, और उनमें ज्यादातर हिंदू हैं, दहशत में जी रहे हैं। उन्हें इसका एहसास हो रहा है कि चूंकि उनमें और मुस्लिमों के चेहरे-मोहरे में बहुत फर्क नहीं है, और डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद अमेरिकी समाज के उन्मत्त हिस्से के लिए इस फर्क को समझ पाना भी मुश्किल है, ऐसे में, उन्हें लंबे समय तक दहशत में रहना पड़ सकता है। नस्लवादी अमेरिकी तो मुस्लिम और सिख में भी फर्क नहीं कर पाते। यह याद रखना चाहिए कि अमेरिका में हुए आतंकवादी हमले के बाद अमेरिकियों ने अनेक सिखों को निशाना बनाया था।
इसके बाद भी भारतीय हिंदुओं का एक हिस्सा अगर यह समझता है कि मुस्लिम-विरोधी ट्रंप उनके दोस्त हैं, तो यह उनका भ्रम भी है और भोलापन भी, क्योंकि ट्रंप केवल मुस्लिम-विरोधी नहीं, बल्कि वह अश्वेत-विरोधी हैं, और भारतीय तथा दक्षिण एशियाई लोगों के अलावा सभी बाहरी लोग उनकी घृणा के दायरे में आते हैं। कुल मिलाकर ट्रंप घनघोर नस्लवादी हैं। वह गोरी चमड़ी वालों को पसंद करते हैं। वह अमीरों को पसंद करते हैं। और इस समाज का हिस्सा होते हुए भी वह औरतों की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं। अगर वह मुसलमानों और दक्षिण एशियाई लोगों के ही खिलाफ होते, तो वह मैक्सिको के लोगों के इतने विरोधी क्यों होते? एक समय अमेरिका ने मैक्सिको के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। दोबारा आतंकवाद अमेरिका को निशाना नहीं बना पाया, तो महाशक्ति देश और उसके पड़ोसियों के सहयोग का ही नतीजा था। लेकिन आज अमेरिका और मैक्सिको के पुराने रिश्ते को खत्म करने के लिए ट्रंप वह सब कुछ कर रहे हैं, जो वह कर सकते हैं। इसलिए यह मानना भोलापन है कि ट्रंप और उनके समर्थक सिर्फ मुस्लिम प्रवासियों को ही निशाना बनाएंगे और दूसरे लोगों को छोड़ देंगे।
वास्तविकता यह है कि ट्रंप की जीत के बाद से अमेरिका में घृणा जनित अपराधों का आंकड़ा बहुत बढ़ गया है। आंकड़े बताते हैं कि ट्रंप की जीत के बाद न्यूयॉर्क में अपराधों की संख्या में 155 गुना बढ़ोतरी हुई है। एक तथ्य यह भी है कि 2015 से 2017 तक अमेरिका में मुस्लिम-विरोधी दलों की संख्या में तीन गुनी वृद्धि हुई है। ऐसे में, यह समझने की आवश्यकता है कि ट्रंप का उदय हवा में नहीं हुआ है। इसके पीछे हाल के वर्षों में वहां उभरी नस्लवादी भावना ज्यादा जिम्मेदार है।
ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप और उनके पति जारेद कुशनर यहूदी हैं। इवांका ने शादी के बाद यहूदी धर्म अपनाया। ट्रंप खुद इस्राइल समर्थक हैं। लेकिन यह देखने वाली बात है कि ट्रंप की जीत के बाद उनके समर्थकों ने जितने लोगों पर हमले किए, उनमें से आधे यहूदी थे।
किसी ने सच ही कहा है, घृणा के वश में होकर जिन्हें निशाना बनाया जाता है, घृणा उनसे अधिक उनका नुकसान करती है, जो इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। नफरत और हिंसा का नुकसान यह है कि एक समय के बाद इसके बल पर राजनीति करने वाले लोग चाहकर भी इससे खुद को अलग नहीं कर पाते हैं। आनेवाले दिनों में डोनाल्ड ट्रंप और उसके समर्थक संभवतः मुस्लिमों को अधिक क्षति पहुंचाएं। लेकिन गैर-मुस्लिमों को भी कोई कम नुकसान नहीं होगा। जो आदमी मानवाधिकार में विश्वास नहीं करता, जो महिलाओं का सम्मान नहीं करता, अहंकार में चूर जिस व्यक्ति के हृदय में हर अश्वेत और हर बाहरी व्यक्ति के प्रति घृणा है, वह मुस्लिमों का विरोधी होने के कारण आपका दोस्त नहीं हो सकता।