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तिरंगा तो ठीक, पर इतना ऊंचा क्यों

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 21 Feb 2016 07:26 PM IST
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जब मैंने सुना कि केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपतियों की बैठक में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने यह निर्देश दिया है कि उन्हें हमेशा राष्ट्रीय झंडा फहराना चाहिए, तो मुझे बेहद खुशी हुई। हमारे युवाओं में देशभक्ति की भारी कमी है, खासकर व्यापक रूप से वित्त पोषित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में, जहां पढ़ने वाले युवाओं के हानिकारक एंग्लो-अमेरिकी असर में आने का खतरा बहुत रहता है और उससे भी बुरी बात यह कि इससे पश्चिमोत्तर के खतरनाक पड़ोसी की घुसपैठ का जोखिम है।


इसलिए जहां तक झंडे का सवाल है, खास तौर पर इसमें मेरी भी मंजूरी दर्ज की जाए। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, हमारे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर पैसा बहाया जाता है। वहां के पुस्तकालयों में इतनी किताबें हैं कि छात्र संभाल नहीं सकते। उनकी प्रयोगशालाएं पूरी तरह सुसज्जित हैं। सातवें वेतन आयोग ने बेहद खूबसूरती से प्राध्यापकों को उनके अनिश्चित श्रम का इनाम दिया है। हमारे केंद्रीय विश्वविद्यालय हर तरह से बेहतर स्थिति में हैं-सिर्फ अपने कुछ छात्रों और (शर्म के साथ कहना पड़ता है) कुछेक अध्यापकों में भारत माता के प्रति ढुलमुल प्रतिबद्धता को छोड़कर।


समय-समय पर प्रेस के कुछ हिस्से ऐसी दुर्भावनापूर्ण कहानियां प्रकाशित कर इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान खींचते हैं कि दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। अब यह सर्वविदित है कि ये सूचियां पश्चिमी साम्राज्यवाद के कुख्यात एजेंटों द्वारा तैयार की जाती हैं। सच्चे देशभक्तों के लिए ऐसी रैंकिंग का कोई मतलब नहीं है। किसी भी तरह अगर एक बार कैंपस में झंडा फहराना लागू कर दिया जाता है, तो छात्रों में देशभक्ति की भावना का अपने-आप संचार होगा तथा अध्यापक व कर्मचारी रैंकिंग की अग्रिम पंक्ति में हमारे देसी विश्वविद्यालयों को पहुंचाने के लिए निश्चय ही प्रेरित होंगे।


मैं इस प्रस्ताव से भी अति प्रसन्न हुआ कि राष्ट्रध्वज को मुख्य जगह पर प्रमुखता से काफी ऊंचे पर लहराया जाएगा और रात में इसे प्रकाशित किया जाएगा। भारतमाता के प्रति छात्रों की प्रतिबद्धता को याद दिलाने के लिए यह बहुत जरूरी है। जाहिर है, इससे निश्चित रूप से कक्षाओं, प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों से आते-जाते तिरंगा हमेशा दिखता रहेगा, खासकर रात में भी, जब देश-विरोधी भावनाएं कुछ कम प्रबुद्ध छात्रों के मन में प्रवेश करती हैं।


इसलिए मानव संसाधन मंत्रालय के प्रस्ताव के बारे में सुनकर मैं काफी खुश हुआ। केंद्रीय विश्वविद्यालय का यह पूर्व छात्र, वहीं का यह पूर्व अध्यापक और एक देशभक्त पहली और दूसरी बार वोट डालने वाले मतदाताओं में देशभक्ति की कमी देखकर वाकई परेशान है। लेकिन इस प्रस्ताव का एक पहलू मुझे परेशान किए हुए है। मंत्रालय ने यह निर्देश क्यों दिया कि झंडा दो सौ सात फीट की ऊंचाई पर ही फहराया जाना चाहिए? यह तो स्वयं स्पष्ट था कि तिरंगा ऊंचा फहराया जाएगा और छात्रों को इसे हमेशा देखते रहना होगा। लेकिन 207 फीट ही क्यों,  200 फीट क्यों नहीं? वस्तुतः 200 फीट की ऊंचाई पर झंडा फहराने से देशभक्ति की भावना ज्यादा प्रबल होती, क्योंकि हम भारतीयों ने ही शून्य का ईजाद किया था और इसे दशमलव प्रणाली में लागू किया था।


200 के साथ एक अन्य अर्थ भी जुड़ा है, जो कम देशभक्तिपूर्ण नही है। सचिन तेंदुलकर ने इतने ही टेस्ट मैच खेले हैं। क्रिकेट, जैसा कि एक बार आशीष नंदी ने हमें याद दिलाया था, एक भारतीय खेल है, जिसका आविष्कार दुर्घटनावश पश्चिम में हुआ। और सचिन तेंदुलकर ऐसे भारतीय हैं, जिनकी देशभक्ति की व्यापक रूप से विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा प्रशंसा की जाती है। यदि झंडे को 207 के बजाय 200 फीट की ऊंचाई पर फहराया जाए, तो यह छात्रों को शून्य के हमारे महान वैज्ञानिक खोज की याद दिलाने के साथ भारत रत्न सांसद सचिन तेंदुलकर के देशभक्तिपूर्ण कर्मों की भी याद दिलाएगा। सचिन तेंदुलकर ने ही सबसे पहले अपने हेलमेट पर तिरंगा लगाया और जब वह अपने बल्ले से पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट और टूर्नामेंट जीत रहे थे, तब केंद्रीय विश्वविद्यालयों के छात्र बमुश्किल अपनी व्यक्तिगत और राष्ट्रीय पहचान ढूंढ रहे थे।


तो फिर मंत्रालय ने 207 का अंक ही क्यों चुना? क्या इसका कोई संबंध अंक-विद्या से है? मैं सर्च इंजन पर ‘207 अंक का प्रतीकात्मक महत्व’ टाइप करता हूं और एक ऐसे साइट पर पहुंचता हूं, जिसमें 207 को फरिश्ते का अंक बताया गया है, जो आपको बताता है कि आप अपना समय आध्यात्मिक विकास में लगाइए और आपको ज्ञान एवं बुद्धि मिलेगी। क्या यह हो सकता है? निश्चित रूप से नहीं। जिस साइट पर 207 अंक के इस जादुई गुणों का बखान किया गया है, वह खतरनाक रूप से विदेशी है। इसके अलावा, माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री ने पद संभालते हुए संविधान की शपथ ली थी, जिसकी एक प्रतिज्ञा वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना है, जो भारतीय नागरिकों का एक मौलिक कर्तव्य भी है।
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इसलिए अंक-विद्या के कारण ऐसा नहीं किया गया है। संभवतः इसके पीछे एक अन्य भारतीय परंपरा, नौकरशाही की जड़ता है। कनॉट प्लेस में राष्ट्रीय झंडा 207 फीट की ऊंचाई पर फहराया गया है। आगे यह प्रकट होता है कि ऐसा कांग्रेस के तब के एक सांसद के (जो अटल देशभक्त नहीं ही हैं) इशारे पर किया गया। शायद यही वजह है कि जब मंत्री के आदेश के पालन के लिए पूछा गया होगा, तो मंत्रालय के एक बाबू ने इसका हवाला देते हुए देशभक्ति से रहित इस अंक के बारे में सुझाया होगा। इसलिए मैं मानव संसाधन विकास मंत्री से अपील करना चाहूंगा कि झंडे की ऊंचाई को सात फीट कम करने के लिए एक और आदेश निर्गत किया जाए। देशभक्तों की वह पीढ़ी, जो अभी पैदा नहीं हुई है, इसके लिए उनका कृतज्ञ रहेगी।


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