सवाल अहम है और परेशान करने वाला भी। ऐसे संस्थानों का क्या होना चाहिए जहां नारे लगाके दुआ पढ़ी जाए, 'भारत के सोलह टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह।' जो संस्थान वैचारिक नफरत से तप रहा हो। जो विचारों की आजादी के नाम पर देश विरोधी आयोजनों के लिए केंद्र में आ जाए। बात यहां तक पहुंचे कि अदालत को भी सुनवाई के लिए माहौल को पाबंद करना पड़े।
कुछ लोग तकनीकी शब्दावली का हवाला देकर इसे देशद्रोह नहीं कहते। कहते हैं ये अभिव्यक्ति की आजादी है। ये अभिव्यक्ति की कैसी आजादी है, जिसमें अपने राष्ट्र के प्रति कोई आस्था न हो? जो नफरत पैदा करती हो? जो देश की सर्वोच्च न्यायिक फैसले पर सवाल उठाती हो? अफजल गुरु का महिमामंडन देश की प्रभुसत्ता, सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति और संसद का अपमान है। पर आतंक की इस वैचारिक मुद्रा से आप कैसे निपटेंगे? इनके साथ तो कुछ राजनेता भी हैं। बुद्धिजीवियों की एक जमात भी है, जो घोषित रूप से राष्ट्रवाद की परिकल्पना से भी नफरत करती है।
दरअसल विश्वविद्यालयों में तार्किक, बौद्धिक और मजबूत लोकतांत्रिक समाज के लिए विमर्श प्राथमिकता होने ही चाहिए। वैचारिक असहमतियों और बहसों की सशक्त परंपरा उच्चतर अकादमिक अनिवार्यता है। पर विश्वविद्यालय राजनीतिक ध्रुवीकरण की असहिष्णुता का केंद्र बन जाए, तो खटका होता है। इसके संकेत जेएनयू में बाबा रामदेव को न बोलने देने तक में दिखने लगते हैं।
जेएनयू परिसर में जो कुछ हुआ वह अप्रत्याशित नहीं था। दशकों से इस विश्वविद्यालय की आबोहवा में अलग बातें हुई हैं। देश में नक्सल आंदोलन किसी भी राज्य में हो, इसके सूत्र यहां के बौद्धिकों से अनायास जुड़ जाते हैं। 2010 में जब दंतेवाड़ा में नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए तो जेएनयू में बड़ा जश्न मना। तीन साल पहले संसद हमले के आरोपी अफजल गुरु को जब फांसी दी गई तो यहां विरोध दिवस मना। उसे शहीद कहा गया। आतंकी मकबूल भट्ट को दी गई मौत की सजा की सालाना शोकसभा भी होती है। लेकिन सरकारें इसे नौजवानों का उत्साह समझकर नजरअंदाज करती रहीं। नतीजतन प्रगतिशील शिक्षा के केंद्र के तौर पर स्थापित यह संस्थान विचित्र कारणों से केंद्र में दिखने लगा। नक्सल आंदोलन के समर्थन और चिढाने के लिए ‘बीफ उत्सव’ होने लगे। कुछ लोगों ने इसे स्वायत्त द्वीप मान लिया।
असहमति और बहस का हक सबको होना चाहिए। लेकिन क्या हम देश की बर्बादी और कश्मीर की आतंक के रास्ते आजादी पर बहस चाहते हैं? जेएनयू परिसर में विमर्श इस बात के लिए नहीं था कि फांसी की सजा होनी चाहिए कि नहीं। या असहमति का अधिकार क्या हो। वहां तो देश को तोड़ने का आह्वान और संकल्प लिया जा रहा था। कभी देश को दो टुकड़े करने की ‘थीसिस’ भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से निकली होगी। लेकिन आज किसी विश्वविद्यालय को निजी हित की राजनीति के मोहरे तैयार करने का मैदान नहीं बनाया जा सकता। आप बेशक किसी पार्टी या व्यक्ति से व्यक्तिगत या वैचारिक नफरत करें। पर यह नफरत विवेक शून्यता की हद तक जाने के लिए विश्वविद्यालय की जमीन क्यों चुने? इन्हें तो स्वस्थ विमर्शों और श्रेष्ठ शोधों के लिए सुरक्षित रहने दीजिए। इस मूल प्रश्न से बात हटाकर दूसरी तरफ मोड़ दी गई है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं