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हारे हुए मन की त्रासदी: जवाब में 69 फीसदी ने कहा- हां, तो किशोरी ने अपनी जान ले ली

मनीषा सिंह Published by: Raman Singh Updated Thu, 23 May 2019 06:05 AM IST
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मनीषा सिंह - फोटो : Amar Ujala

मलयेशिया में एक किशोरी ने इंस्टाग्राम पर पूछा कि क्या उसे मर जाना चाहिए या नहीं। जवाब में 69 फीसदी ने कहा- हां, तो किशोरी ने अपनी जान ले ली। कहा जा रहा है कि किशोरी की मौत के पक्ष में वोट देने वालों पर उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का दोष लगाकर मुकदमा चल सकता है। पर अपने ही देश में मौत को गले लगाने वाले जेएनयू के छात्र थॉमस के बारे में दावा है कि उसने बिना किसी उकसावे के सिर्फ मौत का रहस्य जानने के लिए अपनी जान दे दी।

पुलिस ने बताया कि विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में पंखे से लटककर जान देने से पहले थॉमस ने अपने प्रोफेसर को ईमेल किया, जिसमें मृत्यु को साक्षात (फिजिकल फॉर्म में) देखने की इच्छा जताई गई थी। साल भर पहले दिल्ली के बुराड़ी इलाके में परिवार के 11 लोगों की आत्महत्या के पीछे भी यह दावा किया गया था कि उन्हें लगता था कि वे मौत के रहस्य को जान लेंगे और इस दुनिया में फिर से वापस आ जाएंगे।



समाजशास्त्रीय नजरिये से ये घटनाएं असल में दुनिया में बढ़ते अवसाद (डिप्रेशन) की मिसालें हैं। बेरोजगारी, नौकरी में असंतोष, परिवारों में कमाई को लेकर असंतुष्टि ऐसे-ऐसे अवसाद पैदा कर रही है कि कुछ मामलों में तो इसके घेरे में आया व्यक्ति अपने से ज्यादा दूसरों को नुकसान पहुंचाने का सबब बन जाता है। कुछ वर्ष पूर्व (2015 में) तेलंगाना में 26 साल के एक सिख युवक बलविंदर ने तलवार से 22 लोगों को घायल कर दिया था। उस पर काबू पाने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी, जिसमें वह मारा गया।

पता चला था कि तेलंगाना के करीमनगर कस्बे का निवासी बलविंदर पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। शानदार वेतन पाने के बावजूद वह इसलिए अवसादग्रस्त हो गया था, क्योंकि सिविल सर्विस परीक्षा में वह नाकाम हो गया था। कुछ ऐसा ही हादसा देश के हरियाणा राज्य में नरेश धनखड़ नाम के शख्स के मामले में घटित हुआ। नरेश ने अवसादग्रस्त होकर हरियाणा के पलवल में छह लोगों को मार डाला था।

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मनीषा सिंह - फोटो : Amar Ujala
मलयेशिया में एक किशोरी ने इंस्टाग्राम पर पूछा कि क्या उसे मर जाना चाहिए या नहीं। जवाब में 69 फीसदी ने कहा- हां, तो किशोरी ने अपनी जान ले ली। कहा जा रहा है कि किशोरी की मौत के पक्ष में वोट देने वालों पर उसे आत्महत्या के लिए उकसाने का दोष लगाकर मुकदमा चल सकता है। पर अपने ही देश में मौत को गले लगाने वाले जेएनयू के छात्र थॉमस के बारे में दावा है कि उसने बिना किसी उकसावे के सिर्फ मौत का रहस्य जानने के लिए अपनी जान दे दी।

पुलिस ने बताया कि विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में पंखे से लटककर जान देने से पहले थॉमस ने अपने प्रोफेसर को ईमेल किया, जिसमें मृत्यु को साक्षात (फिजिकल फॉर्म में) देखने की इच्छा जताई गई थी। साल भर पहले दिल्ली के बुराड़ी इलाके में परिवार के 11 लोगों की आत्महत्या के पीछे भी यह दावा किया गया था कि उन्हें लगता था कि वे मौत के रहस्य को जान लेंगे और इस दुनिया में फिर से वापस आ जाएंगे।

समाजशास्त्रीय नजरिये से ये घटनाएं असल में दुनिया में बढ़ते अवसाद (डिप्रेशन) की मिसालें हैं। बेरोजगारी, नौकरी में असंतोष, परिवारों में कमाई को लेकर असंतुष्टि ऐसे-ऐसे अवसाद पैदा कर रही है कि कुछ मामलों में तो इसके घेरे में आया व्यक्ति अपने से ज्यादा दूसरों को नुकसान पहुंचाने का सबब बन जाता है। कुछ वर्ष पूर्व (2015 में) तेलंगाना में 26 साल के एक सिख युवक बलविंदर ने तलवार से 22 लोगों को घायल कर दिया था। उस पर काबू पाने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी, जिसमें वह मारा गया।

पता चला था कि तेलंगाना के करीमनगर कस्बे का निवासी बलविंदर पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। शानदार वेतन पाने के बावजूद वह इसलिए अवसादग्रस्त हो गया था, क्योंकि सिविल सर्विस परीक्षा में वह नाकाम हो गया था। कुछ ऐसा ही हादसा देश के हरियाणा राज्य में नरेश धनखड़ नाम के शख्स के मामले में घटित हुआ। नरेश ने अवसादग्रस्त होकर हरियाणा के पलवल में छह लोगों को मार डाला था।

भारत जैसे आबादी बहुल देश के लिए ऐसा अवसाद एक बड़ी समस्या है, क्योंकि यहां बेरोजगारी की दर काफी अधिक है। बेरोजगारी और नौकरी की अंदरूनी दिक्कतों के कारण जो समस्या पैदा हो रही है, उससे संबंधित एक आंकड़े का खुलासा कुछ वर्ष पूर्व तत्कालीन गृह राज्यमंत्री हरिभाई पारथीभाई चौधरी ने देश की संसद में किया था। उन्होंने राज्यसभा को बताया था कि वर्ष 2014 में रोजगार संबंधी समस्याओं के चलते प्रत्येक दिन करीब तीन लोगों ने आत्महत्या की।

उस वर्ष व्यवसाय और रोजगार से जुड़ी समस्याओं के कारण घोर निराशा में घिरे 903 लोगों ने आत्महत्या की थी। हालांकि देश में कई अन्य कारणों से आत्महत्या करने वालों की तादाद भी बढ़ रही है। अवैध संबंधों के संदेह में या समाज में बदनामी के कारण और प्रेम प्रसंगों में मिली नाकामी की वजह से भी हर साल कई हजार युवा मौत को गले लगा रहे हैं।

देश में आत्महत्या के बारे में जो आंकड़े खुद सरकारी एजेंसियां जारी करती हैं, वे इसलिए ज्यादा चौंकाते हैं, क्योंकि अब महिलाओं के मुकाबले पुरुष ज्यादा बड़ी तादाद में ऐसा कर रहे हैं और इनमें भी बेरोजगारी झेल रहे युवाओं का प्रतिशत सबसे ज्यादा है।

इससे जुड़ी एक विडंबना यह भी है कि आत्महत्या का प्रतिशत देश के विकसित कहे जाने वाले राज्यों में ज्यादा है। जैसे, कि पंजाब और हरियाणा में आत्महत्याओं का प्रतिशत देश के औसत से कहीं ज्यादा है। जिस तरह से हर तीन आत्महत्याओं में एक 15 से 29 वर्ष के युवा कर रहे हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि देश के युवा समाज के लिए ये रुझान खतरनाक हैं।
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