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एक विफल राज्य की त्रासदी

Mon, 14 Jan 2013 11:32 AM IST
मधुरेंद्र सिन्हा
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उस राज्य के बारे में आप क्या कहेंगे, जहां औसतन हर डेढ़ साल में एक मुख्यमंत्री बदल जाता है! जो प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न होने के बावजूद विकास के पायदान पर सबसे पीछे है! यह उस झारखंड की निर्मम सचाई है, जहां एक और सरकार गिर चुकी है और नई सरकार के गठन के लिए जोड़-तोड़ हो रही है।
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झारखंड जब बिहार का हिस्सा था, तब वहां के प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता देखते हुए कहा जाता था कि अगर यह सूबा अलग हो गया, तो देश का सबसे समृद्ध प्रांत होगा। वर्ष 2000 में झारखंड बिहार से अलग हुआ और बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में वहां सरकार बनी।

दुर्दशा की घड़ियां गिन रहे झारखंड में प्रगति की बयार बहने लगी और तेजी से विकास हुआ। बढ़िया सड़कें बनने लगीं, शहरों-कस्बों में गलियां पक्की हो गईं और सिंचाई योजनाओं पर तेजी से काम होने लगा। दूर-दराज के इलाकों में जहां कभी अफसर या सरकारी कर्मचारी भटकते नहीं थे, वहां उनके दर्शन होने लगे। लगने लगा कि झारखंड सफलता का दूसरा नाम है।
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लेकिन मरांडी के सत्ता से बाहर होने के बाद झारखंड में विकास की हवा धीमी पड़ने लगी और राज्य जितनी तेजी से आगे बढ़ा था, उतनी तेजी से पीछे हो गया। आज वहां के लोग पड़ोसी बिहार की प्रगति को हसरत भरी निगाहों से देखते हैं। झारखंड आज भ्रष्टाचार और निकम्मेपन में डूब गया है, प्रगति के पहिये ठप हो गए हैं और भविष्य की कोई किरण नजर नहीं आती।

दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां वहां बुरी तरह विफल रही हैं और अपने निहित स्वार्थों से आगे नहीं निकल पा रहीं। जोड़-तोड़ कर सत्ता पाने की नीति के कारण वहां बारह वर्षों में आठ मुख्यमंत्री बदल गए। भाजपा के अर्जुन मुंडा तीन बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। लेकिन सबसे हैरान निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा ने मुख्यमंत्री बनकर किया। कहते हैं, उन्होंने राज्य की अरबों रुपये की प्राकृतिक संपदा मिट्टी के मोल बेच दी।

लगभग दो वर्षों के कार्यकाल में मधु कोड़ा ने झारखंड को खंडहर में तब्दील कर दिया। पर उनके बाद मुख्यमंत्री बने गुरुजी यानी झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन ने भी राज्य को नीचे ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके दौर में उनके कुनबे ने भ्रष्टाचार को खूब बढ़ावा दिया। जब वहां के राज्यपाल सैयद सिब्ते रजी के हाथ में राज्य के शासन की बागडोर आई, तो उन पर भी गंभीर आरोप लगे। यानी झारखंड हर हाल में भ्रष्टाचार झेलने के लिए अभिशप्त ही रहा।

झारखंड की इस नाकामी ने छोटे राज्यों की अवधारणा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला सवाल तो यही है कि छोटे राज्य क्या बेहतर प्रशासन के लिए उपयुक्त नहीं हैं। जबकि समझा तो यह जाता है कि उन्हें चलाना आसान होगा। आजादी के बाद जब हरियाणा और हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्य बने और उन्होंने प्रगति के पथ पर छलांग लगाई, तो यह लगने लगा कि छोटे राज्य ही सफलता का पैमाना बनेंगे।

हिमाचल में डॉक्टर यशवंत सिंह परमार और हरियाणा में भागवत दयाल शर्मा ने बेहतरीन शुरुआत कर इन राज्यों को आगे बढ़ाया था। उन्हें देखकर ही कहा जाने लगा कि यह मानदंड सही है। लेकिन झारखंड ने तो जैसे इस अवधारणा को ही ध्वस्त कर दिया। दूसरा बड़ा सवाल यह है कि क्या आदिवासी नेतृत्व विकास का रास्ता तलाशने में असमर्थ है। यह सवाल इसलिए भी, क्योंकि बारह वर्षों में वहां आठ मुख्यमंत्री बने और वे सभी आदिवासी थे। उनमें से ज्यादातर ने निराश ही किया।

इनमें शिबू सोरेन से सर्वाधिक हताशा इसलिए पैदा हुई, क्योंकि पृथक झारखंड का झंडा लेकर वह सबसे आगे चले थे। सरल और सहज समझे जाने वाले आदिवासी नेताओं ने जिस तरह राज्य को लुटने में मदद दी, उसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। इससे तो 'माटी के पुत्र को सत्ता' की अवधारणा पर ही पूर्ण विराम लग गया। झारखंड में स्वार्थी आदिवासियों ने जिस तरह जंगल उजाड़े, वैसे ही उनके बेईमान नेताओं ने राज्य को उजाड़ दिया।

अब झारखंड में क्या होगा, यह कोई प्रश्न ही नहीं। जहां नैतिकताविहीन राजनीति और दोमुंहे चरित्र हों, वहां के बारे में कोई क्या कहेगा। जरा उदाहरण देखिए, शिबू सोरेन की पार्टी भाजपा के साथ वहां सत्ता में तो रही, लेकिन केंद्र में वह कांग्रेस का साथ देती रही। अब 81 सीटों वाले विधानसभा में महज 18 यानी एक-चौथाई से भी कम विधायक रखने वाली उनकी पार्टी सरकार चलाने का दावा करती है। उधर महज 13 सीटों वाली कांग्रेस भी सत्ता का स्वाद चखने के लिए बेताब है। लालू प्रसाद यादव ने कई वर्षों से सत्ता देखी नहीं है।

अब वह भी अपने पांच विधायकों के साथ सत्ता में आने के लिए तैयार हैं। यानी खेल खुला है और पत्ते हैं कि कांग्रेस के हाथों में। राज्यपाल सैयद अहमद ने अपनी एक औपचारिक-सी चिट्ठी केंद्र को भेज तो दी है और अब कांग्रेस तय करेगी कि करना क्या है। हो सकता है कि सत्ता पाने के लालच में कांग्रेस यह भूल जाए कि झारखंड मुक्ति मोर्चा ने उससे बातचीत अचानक बंद करके भाजपा के साथ सरकार बनाने का फैसला कर लिया था।

राजनीति में सब कुछ संभव है, और वहां न कोई दोस्त है और न दुश्मन। स्वतंत्र भारत में सत्ता कांग्रेस के पास ही सबसे अधिक रही है और उसे मालूम है कि कैसे सरकारें बनाई जाती हैं। अभी वक्त ऐसा है कि लोकसभा के चुनाव सामने हैं और यह कांग्रेस के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसके पास वहां से सिर्फ एक सांसद है, जबकि सीटें 14 हैं।

लेकिन उस झारखंड का क्या, जो लुटने के लिए अभिशप्त है और जिसने विकास के कदम उठने के साथ ही थमते देखे। एक बार फिर राजनीति की शतरंज बिछ चुकी है। अब हारे-जीते कोई भी, खामियाजा झारखंड की गरीब जनता को ही भुगतना पड़ेगा।
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