कश्मीरी पंडितों का जब नरसंहार हुआ था, तब मैं दिल्ली में रहता था और इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ (आईईजी) में काम करता था। आईईजी के निदेशक जाने-माने समाजशास्त्री त्रिलोकी नाथ मदान थे, जो कि घाटी में ही पले-बढ़े थे और उन्होंने पंडितों के जीवन पर नृवंशविज्ञान से संबंधित क्लासिक काम किया। प्रोफेसर मदान के भाई खुद गांधी मेमोरियल कॉलेज, श्रीनगर के प्रतिष्ठित प्राचार्य थे और उन्हें अपनी मातृभूमि से भागना पड़ा था। उनके पैतृक निवास में तोड़फोड़ की गई थी, परिवार के पास मौजूद अरबी सहित पांच भाषाओं की कीमती पांडुलिपियां जला दी गईं।
कश्मीर छोड़ने को मजबूर हुए कई पंडितों ने कुछ शानदार संस्मरण लिखे हैं। लेकिन इनमें से सर्वाधिक आधिकारिक ब्योरे सोनिया जब्बार के 'द स्पिरिट ऑफ प्लेस' शीर्षक से लिखे निबंध में दर्ज हैं कि आखिर क्यों उन्हें वहां से भागना पड़ा। इसे सिविल लाइंस नामक पत्रिका ने अपने पांचवें अंक में प्रकाशित किया था। तीन पृष्ठों में जब्बार ने जेहादियों द्वारा मार डाले गए 36 पंडित पुरुष और महिलाओं के नाम, उनकी जन्म तारीख, उनके पैतृक गांव और उनके परिवार के सदस्यों के ब्योरे दिए हैं।
इन तथ्यों के बाद के पैराग्राफ में लेखिका ने लिखा, 'ये उन पंडितों में से थोड़े से नाम हैं, 1989-91 के दौरान आतंकवादियों ने जिनकी हत्या कर दी। मैं इसमें नौ सौ और लोगों के नाम जोड़ना चाहती हूं, ताकि आपके सामने पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सके। इन महिलाओं और पुरुषों की मौत धोखे से क्रॉस फायरिंग में नहीं हुई, बल्कि उन्हें सोच-समझकर बर्बरता से निशाना बनाया गया। हत्या किए जाने से पहले इनमें से कई महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। एक महिला को आरी से काटा गया।
पुरुषों के शरीर में उत्पीड़न के निशान दर्ज थे। गला रेतकर, फांसी पर लटकाकर, अंग भंग कर और आंखें निकालकर लोगों को मारा जाना असामान्य नहीं था। उनके शवों को इस तरह से फेंका गया, जिससे कि उन्हें कोई छू भी न सके। करीब 24 महीनों के दौरान साढ़े तीन लाख पंडितों में से नौ सौ लोगों की हत्या का आंकड़ा आश्चर्यजनक है। कोई भी जो यह कहता है कि पंडितों को घाटी से निर्वासित करने की साजिश जगमोहन ने रची वह झूठा है।'
कश्मीरी पंडितों की पहली और सबसे बड़ी त्रासदी यही थी कि उन्हें अपनी मातृभूमि को छोड़ भागने को मजबूर किया गया। उनके अपने लोगों ने उन्हें पीठ दिखा दी या फिर जब जेहाद ने पंडितों को अपने पागलपन का शिकार बनाया, तो उन्होंने उनकी ओर से मुंह फेर लिया। कभी पंडितों को कश्मीर के अन्य धर्मों को मानने वालों से जोड़ने वाले सांस्कृतिक, काव्यात्मक और आध्यात्मिक संबंधों को इस्लामिक कट्टरपंथियों ने बर्बरता से नष्ट कर दिया। अब उनकी यादें, जिनमें से अधिकांश कड़वी यादें है, वहीं रह गई हैं।