मिड-डे मील में रोटी-नमक की मिर्जापुर की कहानी पर बवाल बचा हुआ है। लेकिन मिड-डे मील को लेकर पहली बार गड़बड़ी हुई हो, ऐसा नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले गड़बड़ी की बात सामने आने पर प्रशासन से लेकर सरकारें लीपापोती में जुट जाती थी, इस बार उस पत्रकार के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।
यहां भी गजब का तर्क दिया गया। कहा गया कि पत्रकार महोदय चूंकि अखबार के थे, लिहाजा उन्हें नमक- रोटी खाते नौनिहालों की फोटो लेनी चाहिए थी। पत्रकार ने वीडियो बनाकर बहुत बड़ा गुनाह किया है, क्योंकि वीडियो बनाना तो टीवी चैनल के पत्रकार का काम होता है, अखबार वाले का नहीं। लेकिन मामला बंद होने के बजाय और ज्यादा खुलता जा रहा है। अब पता चला है कि उस स्कूल में इससे पहले भी चावल और नमक बच्चों को दिया गया था। मिड-डे मील में भोजन की गुणवत्ता को लेकर पहले भी शिकायतें आती रही हैं। सवाल उठता है कि स्कूली बच्चों के भोजन से जुड़ी दुनिया की सबसे बड़ी योजना में आखिर ऐसे गड़बड़झाले क्यों होते हैं और उन्हें रोका क्यों नहीं जा रहा।
देश के 11 लाख से ज्यादा स्कूलों के करीब 12 करोड़ बच्चों को मिड डे मील परोसा जाता है। पहले यह व्यवस्था पहली से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए थी, जिसे अब आठवीं तक कर दिया गया है। कुछ जगह तो बारहवीं तक के बच्चों को मिड डे मील में शामिल करने की मांग की जा रही है। इस योजना से बच्चों के बीच में पढ़ाई छोड़ने का सिलसिला अगर रुका नहीं है, तो कम जरूर हुआ है। खासतौर से दलितों, आदिवासियों के इलाकों में इसका अच्छा असर हुआ है। अलग-अलग जातियों के और धर्मों के बच्चे एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। इससे जातिवाद कमजोर हुआ है। आपस में भाईचारा बढ़ा है। पौष्टिक भोजन मिलने से बच्चे बीमार और कमजोर होने से बचे हैं, तो लड़कियों में खून की मात्रा का स्तर सुधरा है।
गुजरात में मिड-डे मील योजना के तहत दिए जाने वाला भोजन आयोडीन युक्त नमक से बनवाना शुरू किया गया। सभी स्कूलों को ऐसा नमक खरीदने के लिए ज्यादा पैसा दिया गया। इससे दो- तीन साल में ही बच्चों को भरपूर आयोडीन मिलने लगा। ऐसे ही जम्मू-कश्मीर में जब भाजपा-पीडीपी की सरकार बनी, तो कुछ समय के लिए केंद्र से मिलने वाले पैसों में देरी हुई। दरअसल मोदी सरकार ने तय किया कि राज्य सरकार जब अपने खर्च का हिसाब केंद्र को (यूटिलिटी सर्टिफिकेट) भेजेगी, तभी आगे की किस्त जारी होगी। ऐसे में स्कूलों में मिड-डे मील का पैसा देरी से पहुंचना शुरू हुआ और कुछ स्कूलों में यह व्यवस्था कुछ समय के लिए बंद करनी पड़ी, तो वहां बच्चों ने भी स्कूल जाना बंद कर दिया।