फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

स्कूली बच्चों का निवाला छीनने वालों के खिलाफ कार्रवाई और खबर दिखाने वाले पत्रकार का अभिनंदन हो

विजय विद्रोही Published by: विजय विद्रोही विद्रोही Updated Sun, 08 Sep 2019 03:53 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

मिड-डे मील में रोटी-नमक की मिर्जापुर की कहानी पर बवाल बचा हुआ है। लेकिन मिड-डे मील को लेकर पहली बार गड़बड़ी हुई हो, ऐसा नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले गड़बड़ी की बात सामने आने पर प्रशासन से लेकर सरकारें लीपापोती में जुट जाती थी, इस बार उस पत्रकार के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। 

यहां भी गजब का तर्क दिया गया। कहा गया कि पत्रकार महोदय चूंकि अखबार के थे, लिहाजा उन्हें नमक- रोटी खाते नौनिहालों की फोटो लेनी चाहिए थी। पत्रकार ने वीडियो बनाकर बहुत बड़ा गुनाह किया है, क्योंकि वीडियो बनाना तो टीवी चैनल के पत्रकार का काम होता है, अखबार वाले का नहीं। लेकिन मामला बंद होने के बजाय और ज्यादा खुलता जा रहा है। अब पता चला है कि उस स्कूल में इससे पहले भी चावल और नमक बच्चों को दिया गया था। मिड-डे मील में भोजन की गुणवत्ता को लेकर पहले भी शिकायतें आती रही हैं। सवाल उठता है कि स्कूली बच्चों के भोजन से जुड़ी दुनिया की सबसे बड़ी योजना में आखिर ऐसे गड़बड़झाले क्यों होते हैं और उन्हें रोका क्यों नहीं जा रहा।



देश के 11 लाख से ज्यादा स्कूलों के करीब 12 करोड़ बच्चों को मिड डे मील परोसा जाता है। पहले यह व्यवस्था पहली से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए थी, जिसे अब आठवीं तक कर दिया गया है। कुछ जगह तो बारहवीं तक के बच्चों को मिड डे मील में शामिल करने की मांग की जा रही है। इस योजना से बच्चों के बीच में पढ़ाई छोड़ने का सिलसिला अगर रुका नहीं है, तो कम जरूर हुआ है। खासतौर से दलितों, आदिवासियों के इलाकों में इसका अच्छा असर हुआ है। अलग-अलग  जातियों के और धर्मों के बच्चे एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। इससे जातिवाद कमजोर हुआ है। आपस में भाईचारा बढ़ा है। पौष्टिक भोजन मिलने से बच्चे बीमार और कमजोर होने से बचे हैं, तो लड़कियों में खून की मात्रा का स्तर सुधरा है।

गुजरात में मिड-डे मील योजना के तहत दिए जाने वाला भोजन आयोडीन युक्त नमक से बनवाना शुरू किया गया। सभी स्कूलों को ऐसा नमक खरीदने के लिए ज्यादा पैसा दिया गया। इससे दो- तीन साल में ही बच्चों को भरपूर आयोडीन मिलने लगा। ऐसे ही जम्मू-कश्मीर में जब भाजपा-पीडीपी की सरकार बनी, तो कुछ समय के लिए केंद्र से मिलने वाले पैसों में देरी हुई। दरअसल मोदी सरकार ने तय किया कि राज्य सरकार जब अपने खर्च का हिसाब केंद्र को (यूटिलिटी सर्टिफिकेट) भेजेगी, तभी आगे की किस्त जारी होगी। ऐसे में स्कूलों में मिड-डे मील का पैसा देरी से पहुंचना शुरू हुआ और कुछ स्कूलों में यह व्यवस्था कुछ समय के लिए बंद करनी पड़ी, तो वहां बच्चों ने भी स्कूल जाना बंद कर दिया।

विज्ञापन

फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
मिड-डे मील में रोटी-नमक की मिर्जापुर की कहानी पर बवाल बचा हुआ है। लेकिन मिड-डे मील को लेकर पहली बार गड़बड़ी हुई हो, ऐसा नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले गड़बड़ी की बात सामने आने पर प्रशासन से लेकर सरकारें लीपापोती में जुट जाती थी, इस बार उस पत्रकार के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। 

यहां भी गजब का तर्क दिया गया। कहा गया कि पत्रकार महोदय चूंकि अखबार के थे, लिहाजा उन्हें नमक- रोटी खाते नौनिहालों की फोटो लेनी चाहिए थी। पत्रकार ने वीडियो बनाकर बहुत बड़ा गुनाह किया है, क्योंकि वीडियो बनाना तो टीवी चैनल के पत्रकार का काम होता है, अखबार वाले का नहीं। लेकिन मामला बंद होने के बजाय और ज्यादा खुलता जा रहा है। अब पता चला है कि उस स्कूल में इससे पहले भी चावल और नमक बच्चों को दिया गया था। मिड-डे मील में भोजन की गुणवत्ता को लेकर पहले भी शिकायतें आती रही हैं। सवाल उठता है कि स्कूली बच्चों के भोजन से जुड़ी दुनिया की सबसे बड़ी योजना में आखिर ऐसे गड़बड़झाले क्यों होते हैं और उन्हें रोका क्यों नहीं जा रहा।

देश के 11 लाख से ज्यादा स्कूलों के करीब 12 करोड़ बच्चों को मिड डे मील परोसा जाता है। पहले यह व्यवस्था पहली से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए थी, जिसे अब आठवीं तक कर दिया गया है। कुछ जगह तो बारहवीं तक के बच्चों को मिड डे मील में शामिल करने की मांग की जा रही है। इस योजना से बच्चों के बीच में पढ़ाई छोड़ने का सिलसिला अगर रुका नहीं है, तो कम जरूर हुआ है। खासतौर से दलितों, आदिवासियों के इलाकों में इसका अच्छा असर हुआ है। अलग-अलग  जातियों के और धर्मों के बच्चे एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। इससे जातिवाद कमजोर हुआ है। आपस में भाईचारा बढ़ा है। पौष्टिक भोजन मिलने से बच्चे बीमार और कमजोर होने से बचे हैं, तो लड़कियों में खून की मात्रा का स्तर सुधरा है।

गुजरात में मिड-डे मील योजना के तहत दिए जाने वाला भोजन आयोडीन युक्त नमक से बनवाना शुरू किया गया। सभी स्कूलों को ऐसा नमक खरीदने के लिए ज्यादा पैसा दिया गया। इससे दो- तीन साल में ही बच्चों को भरपूर आयोडीन मिलने लगा। ऐसे ही जम्मू-कश्मीर में जब भाजपा-पीडीपी की सरकार बनी, तो कुछ समय के लिए केंद्र से मिलने वाले पैसों में देरी हुई। दरअसल मोदी सरकार ने तय किया कि राज्य सरकार जब अपने खर्च का हिसाब केंद्र को (यूटिलिटी सर्टिफिकेट) भेजेगी, तभी आगे की किस्त जारी होगी। ऐसे में स्कूलों में मिड-डे मील का पैसा देरी से पहुंचना शुरू हुआ और कुछ स्कूलों में यह व्यवस्था कुछ समय के लिए बंद करनी पड़ी, तो वहां बच्चों ने भी स्कूल जाना बंद कर दिया।

ऐसे में गांवों की किराना दुकानों से लेकर सब्जी बेचने वाले तक सामने आए (जिनके बच्चे भी स्कूल जाते थे ) और उधार पर राशन  और सब्जी स्कूलों को देनी शुरू की, ताकि बच्चों का स्कूल जाना न रुके। यह उदाहरण बताता है कि आम गरीब जनता की नजर में मिड-डे मील योजना कितनी महत्वपूर्ण है। हालांकि हाल का एक सर्वेक्षण यह भी बताता है कि गांवों में अब लोग मिड डे मील के सरकारी स्कूल के बजाय बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने लगे हैं। कुछ इलाकों में सरकारी स्कूलों में बच्चों का नामांकन काफी हद तक गिरा है। इससे पता चलता है कि हैसियत अच्छी होने पर मां-बाप मुफ्त भोजन की सुविधा पर अच्छी पढ़ाई को वरीयता देने लगे हैं।

मिर्जापुर की घटना पर वापस आते हैं। हर स्कूल का बच्चों की संख्या के हिसाब से दाल, चावल, आटा आदि का कोटा तय होता है। सब्जी, नमक, तेल, मसालों के पैसों की भी व्यवस्था की जाती है। यह सब अग्रिम स्तर पर होता है, ताकि किसी चीज की कमी के कारण बच्चों का निवाला न छिन जाए। ऐसे में, यह बात समझ से परे है कि मिर्जापुर के उस स्कूल में रोटी या चावल के साथ नमक क्यों दिया जा रहा था। अगर सब्जी के लिए पैसे नहीं थे, तो क्यों नहीं थे? इसके लिए जो भी जिम्मेदार है, उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। अगर सब्जी के पैसों से किसी तरह की गड़बड़ी हो रही थी, तो उसकी जांच होनी चाहिए। आखिर बच्चों के मुंह से निवाला क्यों छीना जा रहा है? यह अपराध से कम नहीं है।

अगर पत्रकार ने गलत खबर दिखाई है, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन अगर खबर सही है, तो इधर-उधर की बहानेबाजी बंद कर देनी चाहिए और पत्रकार का बाकायदा सार्वजनिक अभिनंदन किया जाना चाहिए। बहुत-से राज्यों में स्वयंसेवी संगठनों को मिड डे मील स्कूलों तक पहुंचाने का काम दिया गया है। यहां अक्षय पात्र का नाम लिया जा सकता है। ये संस्थाएं आधुनिक रसोई में गर्म खाना तैयार करती हैं और गर्म-गर्म ही स्कूलों तक पहुंचाती हैं। अगर उत्तर प्रदेश सरकार अपनी मिड डे मील योजना चलाने में विफल हो रही है, तो उसे अक्षय पात्र जैसी संस्था को इसका ठेका दे देना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next