पता नहीं किस महानुभाव का सूत्र वाक्य है कि अति जिज्ञासु व्यक्ति प्रायः मूर्ख होते हैं। मान्यवर भूल गए कि जिज्ञासाएं न केवल बौद्धिक-स्तर बढ़ाती हैं, बल्कि छद्म विद्वानों को बेलिबास करने में भी मददगार होती हैं। घटना प्रधान भारत देश में फिजूल की जिज्ञासाएं एकत्र कर लीजिए और उस पर अड़े रहिए। समय कब गुजर जाएगा, पता ही नहीं चलेगा।
ताजा उपजी जिज्ञासा यह है कि इतने शॉर्ट टाइम में बिहार के उपचुनाव में ‘नमो’ की चमक कैसे फीकी पड़ गई और ‘नीला’ (नीतीश-लालू) रंग क्यों चढ़ गया? पर्याप्त आश्चर्य और जिज्ञासा उस दिन भी हुई थी, जब लार्ड्स के मैदान पर कथित ऐतिहासिक विजय पर न शैम्पेन स्नान हुआ, न किसी बांके ने जर्सी हवा में लहराई।
पिछले कुछ दिनों से सहज जिज्ञासा है कि विदेश में टेस्ट मैच पूरे पांच दिन क्यों रखा जाता है, जबकि हमारे ‘रत्न’ तो इसे मात्र तीन दिन में ही फिनिश करने का हौसला रखते हैं। इसके बरक्स फुटबॉल मात्र नब्बे मिनट में फैसला निपटाने वाला खेल है, जिसमें होती है ऊर्जा ही ऊर्जा। उसके खिलाड़ियों को कहां वैसा आराम कि छह गेंद फेंकने के बाद चहल-कदमी करते हुए अपनी पोजिशन बदलें। बेचारा अकेला रेफरी तक भागता-फिरता है। वहीं क्रिकेट के अंपायर-द्वय छह गेंद की गिनती के बाद अलग किनारे रेस्ट करने चले जाते हैं।
एक और अनोखी जिज्ञासा अशांत किए है इन दिनों। श्रीमती ‘गुड्डी’ का सेंस ऑफ ह्यूमर, जिन्होंने कभी अपनी नामवर फिल्म में 'चलो चार पन्नों का लेख लिखो..' मिमिक करके न सिर्फ अपनी मैम का उपहास बनाया था, बल्कि ट्रेजेडी किंग को भी नहीं बख्शा था, गुड्डी से बड़े होने की यात्रा में कहां भटक गया? यह कदाचित अमित सर को ज्ञात हो।
अपनी राजनीतिक बिरादरी के लोगों का तथाकथित उपहास उन्हें इस स्टेज में कल के छोकरों से अच्छा नहीं लगता, तो काहे का आश्चर्य? बहरहाल पेश्तर इसके कि अमर सिंह सपा में आएंगे या नहीं, अभी देशवासियों की सबसे गहन जिज्ञासा यह है कि उनके अच्छे दिन किस ट्रैफिक जाम में फंसे हैं।