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अनोखे विकास मॉडल की ओर

Sun, 14 Sep 2014 04:11 PM IST
आनंद महिंद्रा
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जब कभी मैं अर्थशास्त्रियों और विद्वानों को भारत के बारे में बात करते देखता हूं, तो पाता हूं कि वे निराश हैं। वे भारत की प्रगति को चीन के सामने रखकर देखते हैं कि चीन की आर्थिक विकास दर यह रही और वहां प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश इतने डॉलर का रहा। जब तक हम ऐसे मानकों के आधार पर चीन के साथ भारत की तुलना करते रहेंगे, तब तक हमें पिछड़ा ही माना जाता रहेगा। भारत सरकार अचानक चीन की तरह निर्णायक नहीं बन सकती। कड़े नियंत्रण और अधिनायकवादी चीन में आर्थिक विकास की कीमत समाज में सांस न ले सकने वाली हवा, न पीने के लायक दूध, रिश्वतखोर अधिकारियों और दमनकारी फैक्टरी बॉस के रूप में सामने आई है, जिससे वहां हर साल हजारों-लाखों विरोध प्रदर्शन होते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में इस तरह के तनावों की परिणति हिंसा और अव्यवस्था के रूप में सामने आ सकती है।
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भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से, लेकिन चीन के मुकाबले ज्यादा स्थायी रूप से विकास करे, इसके लिए जरूरी है कि हम अपने मतभेदों को अपना गुण बनाएं। लंबे समय तक हमारी मानसिकता पर आजादी के शुरू के वर्षों का असर रहा, जब पाकिस्तान बना था और भारत सरकार प्रांतों और रियासतों को जोड़कर एक राष्ट्र का गठन करने के लिए संघर्ष कर रही थी। तब भारत के टूटने का खतरा काफी वास्तविक लगता था। अब तो संगठित भारत का विचार इतना व्यापक और गहरा है कि हम विकास के बारे में अपनी समझ से बिल्कुल अलग हटकर सोच सकते हैं। अर्थव्यवस्था को गति देने का सबसे बेहतर तरीका यह हो सकता है कि देश के विभिन्न इलाकों को अपनी तरह से विकास करने दिया जाए।

यह मानने का मतलब नहीं कि भारत पूंजी निवेश का कोई अकेला केंद्र है। भारत के 29 राज्य और सात केंद्र शासित प्रदेश एक दूसरे से उतने ही अलग हैं, जितने कि वे भाषा, भोजन, संस्कृति और विकास के मामले में अलग हैं। यूरोप के देशों में भी यही पैटर्न है। कंपनियां इस बात को समझती हैं, जब वे यह फैसला करती हैं कि फैक्टरियां या शोध एवं विकास के केंद्र कहां स्थापित किए जाएं। वे यह देखती हैं कि कर नीतियां कहां ज्यादा अनुकूल हैं, कानूनी और भौतिक ढांचा कहां कैसा है और मजदूरी किस राज्य में सस्ती पड़ती है। जिस तरह चीन के पूर्वी समुद्री तट पर स्थित कुछ राज्य दूसरे राज्यों से इस मामले में आगे हैं, उसी तरह भारत में भी कुछ राज्य दूसरे राज्यों के मुकाबले ज्यादा लाभ की स्थिति में हो सकते हैं।
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चीन की तरह भारत की भी चुनौती यह है कि एक अरब से ज्यादा की आबादी का किस तरह शहरीकरण किया जाए। पिछले दो दशकों में लाखों-करोड़ों लोग शहरों में आकर बसे हैं, जबकि करोड़ों लोग जल्द ही शहरों में बस जाएंगे। हम इस प्रवाह को रोकने की आशा नहीं कर सकते, क्योंकि शहरीकृत समाज उच्च साक्षरता दर से लेकर निम्न शिशु मृत्यु दर जैसे सकारात्मक परिणाम देता है।

भारत को विकास का लाभ बांटने का तरीका खोजना होगा और देश भर में ऐसे शहरी केंद्र बनाने होंगे, जो प्रतिभा और पैसे को आकर्षित कर सकें। हमें सैकड़ों- हजारों छोटे शहरों का विकास करना होगा। तब हम शायद एक नहीं, हजारों सिंगापुर जैसा एक शहरी जाल कायम कर सकते हैं। इंटरनेट के कारण आज विश्व सिकुड़ गया है। हमें भारतीय उपमहाद्वीप के भी इसी तरह सिकुड़ने को एक अवसर के रूप में देखना चाहिए। 4जी कनेक्टिविटी के बाद अनेक कारोबार कहीं से भी बैठकर किए जा सकेंगे। 3 डी प्रिंटिंग जैसी टेक्नोलॉजी के बाद मैन्युफैक्चरिंग का काम भी बांटा जा सकता है। जैसे ही हर घर एक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में बदला, लघु उद्यमी आधुनिक भारत में भी फलने-फूलने लगेंगे। प्रतिस्पर्धा के कारण शहरों को भी नए प्रयोग करने होंगे। जैसे चेन्नई के बाहर महिंद्रा वर्ल्ड सिटी सहित अनेक कंपनियों ने भी रहने और नियोजित परिसरों में काम करने के नए तरीके तलाशने शुरू किए हैं।
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(लेखक महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन हैं और यह मेकेंजी द्वारा प्रकाशित पुस्तक रिइमेजनिंग इंडिया में प्रकाशित उनके लेख का संपादित अंश है)
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