आम बजट एक बहुप्रतीक्षित वार्षिक अनुष्ठान है। लाइसेंस राज के दिनों में इसका खास महत्व था, जब सरकार किसी के प्रति उदारता दिखाने या किसी को दंडित करने के लिए अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करती थी। उदाहरण के लिए, ऐसे ही एक बजट में प्यूरीफाइड टेरेफेथेलिक एसिड (पीटीए) के दाम घटा दिए गए थे और डाइमिथाइल टेरेफैथलेट (डीएमटी) के दाम बढ़ा दिए गए, जिससे पॉलिस्टर फिलामेंट यार्न बनाने वाले दो शीर्ष निर्माताओं के बीच देश की सबसे भीषण कॉरपोरेट जंग छिड़ गई थी।
पी वी नरसिंह राव द्वारा शुरू किए गए आर्थिक उदारीकरण के दौर ने इस विशेषाधिकार की अक्सर कीमत चुकाई है। दरों का पूर्वानुमान निरंतर जारी है। इससे सैद्धांतिक दिशा का पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है।
इस बजट में अचंभित करने वाली कोई चीज नहीं है। जो थोड़ी-बहुत उम्मीद थी भी, उसे विमुद्रीकरण जैसे जल्दबाजी में उठाए गए अविवेकी कदम ने खत्म कर दिया। दरअसल जख्मों को भरने के लिए कड़वी दवा की जरूरत होती है। बजट का बड़ा हिस्सा तो पहले से तय मदों में खर्च हो जाता है। ये हैं ब्याज का भुगतान, वेतन और पेंशन। इन पर कुल आवंटन का साठ फीसदी खर्च हो जाता है। बजट का आठ से पंद्रह फीसदी हिस्सा सब्सिडी में चला जाता है, और यह अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम पर निर्भर भी है। कुछ वर्ष पूर्व जब कच्चे तेल का दाम 100 डॉलर था, तब तेल पर दी जाने वाली सब्सिडी 1,30,000 करोड़ रुपये थी। पिछले वर्ष यह 27,500 करोड़ रुपये थी। इसी तरह से प्रतिरक्षा खर्च, वेतन और पेंशन का बोझ बढ़ने के बावजूद हथियारों और उपकरणों की खरीद में होने वाली घट-बढ़ के कारण लचीला बना हुआ है। लेकिन यह बजट का 12 से 15 फीसदी तक तो होता ही है। इस तरह से बजट का 85 फीसदी हिस्सा तो पहले से तय प्रतिबद्धताओं में ही चला जाता है। यानी आम बजट में सिर्फ 15 फीसदी हिस्से पर ही नजर होती है कि आखिर इसका कैसे उपयोग होगा। इस पंद्रह फीसदी हिस्से में भी बहुत लचीलेपन की गुंजाइश नहीं होती, क्योंकि कई योजनाएं तो पहले से जारी होती हैं, जिन्हें आगे बढ़ाना होता है।
इस बारे बजट में लोगों की उत्सुकता इसलिए थी, क्योंकि यह नोटबंदी की पृष्ठभूमि में पेश किया गया, जिसने अर्थव्यवस्था पर गंभीर चोट की है। यहां तक कि सरकार भी अब मान रही है कि इसकी वजह से विकास पर खासा असर पड़ा है। पिछले वर्ष बजट के समय जीडीपी की विकास दर 7.6 फीसदी से 7.8 फीसदी रहने की बात की जा रही थी। मुख्य आर्थिक सलाहकार ने मंगलवार को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में इसके 6.5 से 6.75 फीसदी रहने का अनुमान व्यक्त किया है। सरकार, यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी स्वीकार किया है कि विकास दर में एक फीसदी की गिरावट आई है, जिसका मतलब है डेढ़ लाख करोड़ रुपये का नुकसान।
इस गिरावट का राजनीतिक नुकसान कहीं अधिक हो सकता है, खासकर यह देखते हुए कि अभी पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है, जिसने लोकसभा चुनाव में भाजपा को 72 सीटें दी थीं। लिहाजा इस बात की संभावना थी कि नोटबंदी से पैदा हुई तकलीफों को कम करने के लिए कोई बड़ा लोकलुभावन कदम उठाया जा सकता है। मगर ऐसा नहीं किया गया। इसके लिए हमें मोदी सरकार का शुक्रिया अदा करना चाहिए।
इस बजट में दो चीजें पहली बार हुई हैं। पहली है बजट पेश किए जाने की तारीख में बदलाव। और दूसरा है आम बजट में रेल बजट का विलय। इसने सरकार को कुछ निश्चित आवंटनों को छिपाने का अवसर दिया। उदाहरण के लिए, वित्त मंत्री जेटली ने परिवहन पर कुल पूंजीगत खर्च 1,28,000 करोड़ रुपये की बात की, मगर पिछले वर्ष यह सिर्फ 21,000 करोड़ रुपये ही था। लेकिन क्या इस वर्ष के आवंटन में रेलवे भी शामिल है, जैसा कि उनके भाषण से लगता है? ऐसी स्थिति में तो आवंटन पिछले वर्ष की तुलना में 30,000 करोड़ रुपये कम ही है। सरकार को इस बारे में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। इसी तरह से वित्त मंत्री ने मनरेगा के आवंटन में भारी बढ़ोतरी का जिक्र किया है, पर बारीकी से अध्ययन करने से पता चलता है कि यह भारी बढ़ोतरी पिछले वर्ष के खर्च 47,499 करोड़ रुपये से सिर्फ 501 करोड़ रुपये ही अधिक है। चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने की यह प्रवृत्ति क्षुब्ध करने वाली है।
बजट में किए गए कुछ प्रस्तावों के दूरगामी असर हो सकते हैं। इसमें सबसे अहम है चेक अमान्य होने से जुड़े कानूनों को कड़ा किया जाना। बड़े लेन-देन नकद में किए जाने का यह एक बड़ा कारण रहा है। यदि ऐसे दोषियों को सजा देने की प्रक्रिया संक्षिप्त करने के साथ ही कड़ी की जाए, तो इसका व्यापक असर हमारे आपसी व्यवहार पर पड़ेगा और सरकार को भी उसका हिस्सा मिल सकेगा। एक और सकारात्मक कदम एफआईपीबी (फॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड) को भंग करने के रूप में उठाया गया है। यह विदेशी निवेश की राह में बड़ी बाधा बन गया था।
सरकार ने मनरेगा को काम के लक्ष्य से जोड़ा है। मसलन जल संग्रहण क्षमता बढ़ाने के लिए तालाब बनाने का प्रस्ताव है। सरकार इनके निर्माण की निगरानी उपग्रह से करने की योजना भी बना रही है, ताकि गलत दावे न किए जा सकें। यह काफी समय से लंबित था। राजनीतिक चंदे की सीमा घटाकर दो हजार रुपये की गई है, जिससे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला। कुल मिलाकर यह ऐसा बजट है, जैसा कि उम्मीद की गई थी। इसमें राजनीतिक लोकलुभावन कवायद से बचा गया है, लेकिन इसमें कोई बड़ा आर्थिक सुधार भी नहीं है। देश जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसे यह नहीं बदलने जा रहा है। वास्तव में यह काम चलाऊ बजट है। यह और बेहतर हो सकता था या फिर बदतर भी।
-सेंटर फॉर पॉलिसी अल्टरनेटिव के प्रमुख