जीवन में अक्सर ऐसा ही होता है। जीतने वाले को जग भलाई मिलती है और हारने वाले को केवल हरिनाम का ही सहारा रहता है। लेकिन कुछ ऐसे विरले होते हैं, जिनके लिए हार या जीत का अंतर नाममात्र रहता है। वे जीत कर भी हार को देखना, समझते हैं और हार में भी जीतना जानते हैं। उनके लिए खेलना ही महत्वपूर्ण रहता है। टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर ऐसे ही व्यक्तित्व हैं।
ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर के रॉड लेवर टेनिस अरीना पर आस्ट्रेलियाई ओपन जीतने पर रोजर फेडरर ने जो कहा, वह उन्हें महानतम खिलाड़ी बना देता है। फेडरर के चिरप्रतिद्वंद्वी राफेल नदाल ही फाइनल में खेल रहे थे। नदाल चोट के कारण लंबे समय से जूझ रहे थे। फेडरर ने भी पिछला ग्रैंडस्लैम 2012 में जीता था। यानी दोनों लंबे संघर्ष के बाद अच्छा खेलकर फाइनल में पहुंचे थे। फाइनल में दोनों ने टेनिस भी लाजवाब खेली। फेडरर ने नदाल को स्वस्थ होने और अच्छा खेलने पर बधाई दी। फिर नदाल को कहा, मैं तुम्हारे लिए खुश हूं, मैच इतना शानदार था कि मुझे खुशी ही होनी थी। इसके बाद फेडरर बोले ‘टेनिस कठोर खेल है और इसमें ‘ड्रा’ की गुंजाइश नहीं होती। अगर ‘ड्रा’ की गुंजाइश होती, तो आज रात मैं यह ट्रॉफी खुशी से नदाल के साथ बांट लेता।
रोजर फेडरर का व्यक्तित्व सिर्फ उनके खेल में ही नहीं उभरता। टेनिस कोर्ट के बाहर जो फेडरर हैं, वही उनके खेल को महानतम और उन्हें अनुकरणीय बनाता है। फेडरर हार या जीत किसी भी स्थिति में जैसा आदर्श व शालीनता दर्शाते हैं, उसका कोई सानी नहीं है।
रविवार को उन्होंने अपना 18वां टेनिस ग्रैंडस्लैम जीता। सबसे ज्यादा एकल खिताब जीतने का कीर्तिमान तो वह पांच साल पहले ही बना चुके थे। 2012 में अपना सातवां विम्बलडन खिताब जीतकर वह अब तक के सबसे सफल टेनिस खिलाड़ी हो गए थे। उनके बाद चौदह ग्रैंडस्लैम टेनिस प्रतियोगिता जीतने वाले पीट सैम्प्रास और राफेल नदाल ही थे। सैम्प्रास ने पहले ही खेलना छोड़ दिया था और नदाल चोटिल होते रहे हैं। इसलिए जब नदाल स्वस्थ होकर आस्ट्रेलियाई ओपन फाइनल में पहुंचे, तो फाइनल तो लाजवाब होना ही था। सारी दुनिया की निगाहें इस मैच को देखने के लिए लालायित थीं।
मैलबर्न के रॉड लेवर अरीना में जो आक्रमक और आकर्षक टेनिस खेला गया, वह जीवन भर याद रहने वाला है। दोनों ओर से हैरान करने वाली शॉट पर शॉट लग रही थीं। दोनों में से कोई हारने को तैयार नहीं था। और जीतने के लिए एक-दूसरे से अच्छा खेलने में दोनों लगे थे। 2012 के विम्बलडन के बाद माना यह जा रहा था कि अब फेडरर इससे अच्छा तो खेल नहीं ही पाएंगे, और आगे लंबा भी नहीं खेल सकेंगे। पैंतीस साल की उम्र टेनिस खेल की कठोरता के लिए अच्छी-खासी उम्र होती है।
फेडरर पांचवें सैट में 1-3 से हार रहे थे। फिर उसी सैट में जब 5-3 से आगे हुए, तो उनकी सर्विस थी। 40-40 गेम पाइंट पर जब फैडरर ने ‘ऐस’ मारा तो ‘एडवांटेज’ पर आए। नदाल ने अगली सर्विस तो वापस की। लेकिन फिर फेडरर ने साइड लाइन के पास शानदार क्रासकोर्ट शॉट मारा, तो नदाल देखते रह गए। और फेडरर ने अपना पांचवा आस्ट्रेलियाई ओपन जीत लिया था। लेकिन फेडरर को हार या जीत से ज्यादा खेलते रहने से प्रेम रहा है। इसलिए वह अभी भी खेल रहे हैं। फेडरर तो जीते ही, लेकिन उनके साथ टेनिस और खेलों का औचित्य भी जीत गया। फेडरर हैं, तो खेल जीवंत हैं और जीवन भी आनंदमय है।