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सामरिक रक्षा कवच बनने की ओर

Tue, 10 Mar 2015 08:02 PM IST
तरुण विजय
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आज से शुरू हो रही सेशेल्स, मॉरीशस और श्रीलंका की यात्रा बहुत समय से उपेक्षित हिंद महासागरीय देशों के साथ संबंध बढ़ाने की ऐसी पहल है, जो कूटनीतिक सागरमंथन कही जा सकती है। पिछले 34 वर्षों में वह सेशेल्स जाने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं और 28 साल बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री श्रीलंका जा रहा है। इसी तरह नौ वर्ष के अंतराल के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली मॉरीशस यात्रा होगी।
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सेशेल्स हिंद महासागर का एक छोटा, लेकिन सामरिक महत्व का द्वीप है, जहां चीन लगातार अपनी दखल बढ़ाता जा रहा है। सेशेल्स को चीन ने यह भरोसा दिलाया कि वह अफ्रीका का हांगकांग बन सकता है। अब तक चीन की सेशेल्स में 16 बड़ी सरकारी वित्तीय परियोजनाएं चल रही हैं और आठ करोड़ अमेरिकी डॉलर की सहायता दी जा चुकी है। सेशेल्स में चीन के रक्षा प्रतिनिधिमंडल लगातार जाते रहते हैं। चीन ने सेशेल्स को दो वाई 12 जासूसी विमान और एक सचल नौसैनिक अस्पताल भेंट किया है।

115 छोटे छोटे द्वीपों से बने सेशेल्स की मौजूदा आबादी 93 हजार है और वहां भारतीय मूल के दस हजार नागरिक रहते हैं। भारत ने अब तक सेशेल्स को एक डोरनियर विमान और दो पुराने चेतक हेलीकॉप्टर देने के अलावा वहां के सैनिकों प्रशिक्षण भी दिया है। प्रधानमंत्री मोदी सेशेल्स को सागर तटीय निगरानी राडार सिस्टम भेंट करने वाले हैं।
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लंबे समय से चीन सेशेल्स में अपने समुद्री जहाजों को सागर के बीच तेल की आपूर्ति के नाम पर अपना नौसैनिक अड्डा बनाने की कोशिश कर रहा है। वास्तव में संपूर्ण अफ्रीका क्षेत्र में चीन के नौसैनिक हितों की रक्षा के लिए सेशेल्स बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह इसी क्षेत्र में मॉरीशस के पास दिएगोगार्शिया में अमेरिकी नौसैनिक अड्डे से समक्ष अपना प्रतिरोधी केंद्र बनाना चाहता है।

इस परिस्थिति में हिंद महासागर भारत के सामरिक हितों की रक्षा का सबसे बड़ा क्षेत्र बना है। यही एकमात्र महासागर है, जो किसी एक देश यानी भारत के नाम पर है। यहां अमेरिका तथा चीन के मध्य प्रतिस्पर्धा भारत को इस संपूर्ण क्षेत्र में शांति क्षेत्र बनाए रखने के लिए अपनी भूमिका बढ़ाने के लिए प्रेरित कर रही है। भारत के सामने हिंद महासागरीय देशों में अपनी पहुंच बढ़ाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि हमारी संपूर्ण आर्थिक प्राणरेखा हिंद महासागर से गुजरती है। स्वेज नहर, मलक्का, अरब सागर, बंगाल की खाड़ी जैसे क्षेत्र भारत के लिए 'अस्तित्व की चुनौती' जैसा महत्व रखते हैं। संसार का 80 फीसदी से ज्यादा तेल का पारगमन हिंद महासागर से होता है। उसमें से 40 प्रतिशत होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है। दुनिया के आधे से ज्यादा सशस्त्र संघर्ष, युद्ध और सैनिक तनाव हिंद महासागर क्षेत्र में होते हैं। यहीं से बंगाल की खाड़ी होते हुए अंडमान सागर, दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में भारत चीन के विरोध और सैनिक प्रतिरोध का अनुभव कर रहा है।

इसी विशेष परिस्थिति के चलते अमेरिका का पांचवां युद्धक जहाजी बेड़ा बहरीन में लंगर डाले हुए है और दिएगोगार्शिया द्वीप पर स्थित अमेरिकी नौसेना और वायु सेना का आधार केंद्र हिंद महासागर के तमाम क्षेत्रों पर नजर रखता है। अमेरिका एवं चीन के अलावा फ्रांस ने दिज्बुति रियूनियन और आबुधाबी में अपनी महत्वपूर्ण नौसैनिक उपस्थिति कायम रखी है।

ऐसे में भारत के लिए सेशेल्स, मॉरीशस, श्रीलंका, मालदीव और माली जैसे देश छोटे होते हुए भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। मॉरीशस तो वैसे भी 'लघु भारत' के नाम से विख्यात है, जहां 1820 से भारत से मजदूर आने शुरू हुए और उन्होंने रामचरित मानस के सहारे अपने धर्म और भारत से रिश्तों को जीवित रखा। दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटते वक्त 1901 में महात्मा गांधी मॉरीशस में रुके थे। उनके प्रति श्रद्धा जताने के लिए मॉरीशस प्रति वर्ष 12 मार्च को राष्ट्रीय दिवस मनाता है, जिस दिन गांधी जी ने भारत में दांडी कूच प्रारंभ किया था। संबंधों में गर्मजोशी का एक प्रमाण यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में गैर सार्क देशों से आमंत्रित एक मात्र राष्ट्राध्यक्ष मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीन चंद्र रामगुलाम थे। भारत मॉरीशस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और मॉरीशस इस संपूर्ण क्षेत्र में भारत का सबसे विश्वसनीय बंधुमित्र देश है।

प्रधानमंत्री अपनी यात्रा के अंत में श्रीलंका पहुंचेंगे, जहां नवनिर्वाचित गठबंधन सरकार के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना से उनकी शिखर वार्ता होगी। तमिलभाषी समुदाय को भी प्रधानमंत्री से बहुत उम्मीदें हैं। वह वहां तमिलभाषी शरणार्थियों के लिए भारतीय सहायता से निर्मित हो रहे पचास हजार घरों में से तैयार हो चुके 27 हजार घर तमिलभाषी लोगों को समर्पित करेंगे। इसके अलावा वह कोलंबो से जाफना तक भारतीय सहायता से निर्मित यलदेवी रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाएंगे।

मगर सबसे बड़ी बात है-भारत-श्रीलंका संबंधों को विश्वास और सामरिक महत्व के अपेक्षित स्तर तक ले जाना। महिंदा राजपक्षे के समय चीन की श्रीलंका में उपस्थिति खतरनाक स्तर तक बढ़ गई थी। न केवल चीनी पनडुब्बियों को श्रीलंकाई सागर क्षेत्र में रुकने की इजाजत दी गई थी, बल्कि श्रीलंका के एक महत्वपूर्ण बंदरगाह के निर्माण का काम भी चीन को दिया गया, जिसके कारण मलक्का जलडमरूमध्य पर अपनी निर्भरता कम करते हुए चीन के समुद्री जहाजों को कोलंबो से होकर गुजरने का मार्ग मिल गया।

ऐसे में प्रधानमंत्री की यह सागरमंथन यात्रा भारत के सामरिक हितों की रक्षा और हिंद महासागर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी देशों की अवांछनीय दखल और भारत विरोधी प्रभुता रोकने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। इससे भारत ही नहीं, हिंद महासागर क्षेत्र के भारत मित्र देशों को भी सामरिक रक्षा कवच और आर्थिक लाभ होगा।
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