हिमाचल प्रदेश से खबर है कि टमाटर उत्पादक किसानों को 102 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से अधिकतम कीमत मिल रही है, जो सेब की कीमत से भी ज्यादा है। यहां तक कि पंजाब में भी किसानों को 80 से 100 रुपये प्रति किलोग्राम के मिल रहे हैं, जबकि शॉपिंग मॉल में उपभोक्ता के लिए कीमत 97 से 137 रुपये प्रति किलोग्राम है। इसे दूसरे शब्दों में कहें, तो मुनाफे में व्यापारियों के हिस्से में काफी कमी आई है, जिसके चलते किसानों को मोटे तौर पर अंतिम उपभोक्ता मूल्य का 70 से 80 फीसदी हिस्सा मिल रहा है। मैं चाहूंगा कि तमाम सब्जियों और फलों के मामले में यह प्रवृत्ति देखने को मिले।
भारतीय रसोई के एक महत्वपूर्ण मसाले- जीरे का थोक मूल्य भी बढ़ गया है। बारिश के कारण उत्पादन में भारी गिरावट और निर्यात के लिए मांग बढ़ने से जीरे का थोक मूल्य बढ़कर 55,750 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया। इसके अलावा, जलवायु संबंधी अनियमितताओं के कारण इस सीजन में हिमाचल प्रदेश में ताजा सेब की फसल में 50 फीसदी की गिरावट आने की आशंका है। ऐसे में, लगता है कि जब बाजार में नई फसल आएगी, तो उसकी खुदरा कीमतें अपेक्षाकृत ज्यादा होंगी। इसका मतलब है कि किसानों को उम्मीद से बेहतर कीमत मिलेगी। इसका एक संदेश बिल्कुल साफ है कि जब तक किसान अतिरिक्त फसल उत्पादित करने के जुनून से बाहर नहीं निकलेंगे, बाजार उनके साथ न्याय नहीं करेगा।
आमतौर पर सब्जियों और फलों के उपभोक्ता मूल्य में बढ़ोतरी का लाभ किसानों को नहीं दिया जाता है। मांग और आपूर्ति का समीकरण हमेशा काम नहीं करता है। ज्यादातर देखा गया है कि खुदरा व्यापार की कीमतों में हेर-फेर से उपभोक्ता कीमतों में अचानक बहुत तेज वृद्धि होती है। उपभोक्ताओं को जहां अधिक कीमत चुकाने के लिए मजबूर किया जाता है, वहीं किसानों को बढ़े हुए मूल्य का लाभ नहीं दिया जाता है। अब शिमला मिर्च का ही उदाहरण ले लीजिए, कुछ ही हफ्ते पहले पंजाब के किसान शिमला मिर्च को सड़कों पर फेंक रहे थे, क्योंकि व्यापारी उन्हें एक रुपये प्रति किलोग्राम की दर से भी कीमत नहीं देना चाह रहे थे। जबकि फेरी वाले शहरी उपभोक्ताओं से प्रति किलोग्राम शिमला मिर्च की कीमत 30 रुपये तक वसूल रहे थे।
इसका मतलब है कि बाजार में बिचौलियों का कमीशन 2,900 फीसदी होगा, जो एक तरह से शोषण है। किसान प्याज को दो से तीन रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेच रहे थे, लेकिन खुदरा बाजार में इसकी कीमत 20 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जो बताता है कि व्यापारियों को 900 फीसदी मुनाफा मिल रहा था।
हम इसे बाजार की चतुराई कहकर खारिज कर सकते हैं, लेकिन वास्तव में यह किसानों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। जरा उस झटके की कल्पना कीजिए, जो किसानों की आजीविका पर हमले करता है। जब किसान उत्पादन लागत भी नहीं मिलने पर अपनी मेहनत से उपजाई फसल को नष्ट करने के लिए मजबूर होते हैं। कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ से एक खबर आई थी, जिसमें बताया गया था कि कैसे महासमुंद के एक किसान को पूरी तरह से नुकसान उठाना पड़ा था, जब उसे रायपुर मंडी में 1,475 किलोग्राम बैंगन बेचने पर परिवहन एवं अन्य खर्चों को पूरा करने के लिए अपनी जेब से 121 रुपये का भुगतान करना पड़ा।
सिर्फ भारत ही नहीं, अमेरिका और ब्रिटेन में भी किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। अमेरिका में जहां अंतिम उपभोक्ता मूल्य में से किसानों की हिस्सेदारी तेजी से घटी है, वहीं ब्रिटेन में एक अध्ययन से पता चलता है कि कृषि व्यवसाय करने वाली कंपनियां दैनिक उपयोग में आने वाले आधा दर्जन उत्पादों की बिक्री से होने वाले मुनाफे का मुश्किल से एक फीसदी हिस्सा ही किसानों को देती हैं।
इस तरह की विसंगतियां बाजार संचालन के तरीके में खामियों का परिणाम हैं। हालांकि हर तरह के आर्थिक सुधार किए गए हैं, लेकिन व्यापार के क्षेत्र में बहुत सुधार नहीं हुए हैं। यह अनिवार्य है, क्योंकि कृषि आपूर्ति शृंखला बेहद जटिल है, जिसमें अन्य भागीदार तो मुनाफा कमा ले जाते हैं, लेकिन किसान ही उससे वंचित रह जाते हैं। उपभोक्ताओं को समझना चाहिए कि सिर्फ किसान ही नहीं, बल्कि वे भी व्यापारियों द्वारा ठगे जा रहे हैं। मुक्त बाजारों के भरोसे छोड़ने से दुनिया में कहीं भी किसानों को उच्च आय नहीं मिल पाई है। अगर बाजार किसानों को लाभ पहुंचाता, तो कोई वजह नहीं थी कि अमेरिका को हर साल प्रति किसान 79 लाख रुपये की घरेलू सहयता प्रदान करनी पड़ती।
जाहिर है, कृषि व्यापार (जिसमें थोक एवं खुदरा बाजार, दोनों शामिल हैं) में तत्काल सुधार की आवश्यकता है और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसानों को अंतिम उपभोक्ता मूल्य का न्यूनतम 50 फीसदी हिस्सा मिले। यदि टमाटर का खुदरा मूल्य 100 रुपये प्रति किलोग्राम है, तो किसानों को कम से कम 50 रुपये प्रति किलोग्राम कीमत मिले और बाजार यदि इससे भी ज्यादा कीमत किसानों को दे सकता है, तो वह स्वागत योग्य है। जिस तरह अमूल कोऑपरेटिव यह सुनिश्चित करता है कि डेयरी किसानों को अंतिम उपभोक्ता मूल्य का कम से कम 80 फीसदी मिले, उसी तरह फलों एवं सब्जियों के व्यापार में भी करने की जरूरत है।
जैसा कि खबरों में बताया गया है, यदि सरकार कर्मचारियों के लिए पेंशन फंड को बाजार से जोड़ने की योजना बना रही है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उन्हें अंतिम वेतन का कम से कम 40 फीसदी पेंशन मिल सके, तो मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि आपूर्ति शृंखला संतुलन को इसी तरह समायोजित नहीं किया जा सकता, ताकि किसानों को खुदरा मूल्य का कम से कम 50 फीसदी मिल सके। सिर्फ कर्मचारियों के लिए ही क्यों, किसानों के लिए मूल्य निर्धारण मानदंड तय करने की खातिर भी एक विशेषज्ञ समिति गठित करने की आवश्यकता है।