गौरतलब है कि मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र वैश्विक आतंकवादी घोषित कर चुका है और वह भारत के सर्वाधिक वांछित आतंकवादियों में से एक है, जिसका संबंध 2001 के संसद हमले, 2008 के मुंबई हमले, 2016 के पठानकोट हमले और 2019 के पुलवामा हमले से रहा है। जिस आतंकवादी को लेकर इस्लामाबाद 2021 से यह दावा कर रहा है कि वह अब पाकिस्तान में नहीं है, उसे पकड़ने के लिए अब पांच वर्ष बाद इनामी राशि बढ़ाना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। खासकर तब, जब अक्तूबर में वित्तीय कार्रवाई कार्यबल, यानी एफएटीएफ की बैठक होनी है और पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ अपनी कार्रवाइयों का हिसाब देना है।
पाकिस्तान 2018 से 2022 तक एफएटीएफ की ग्रे सूची में रहा था और जाहिर है कि वह अब दोबारा इस सूची में बिल्कुल नहीं जाना चाहेगा। ऐसे में, यह कदम आतंकवाद के खिलाफ वास्तविक कार्रवाई के बजाय वैश्विक दबाव से बचने की कोशिश अधिक दिखाई देता है। आतंकवाद के सवाल पर पाकिस्तान की कथनी व करनी में अंतर भी साफ दिखाई देता है। अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने पर प्रतिबंध, गिरफ्तारियां, इनाम और जांच जैसी कार्रवाइयों की घोषणाएं होती हैं, पर दबाव कम होते ही वह अपने पुराने ढर्रे पर लौट आता है।
पिछले वर्ष ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारत ने जैश के मुख्यालय को तहस-नहस कर दिया था, तब उसमें मारे गए मसूद के करीबियों के जनाजे में कथित तौर पर पाकिस्तानी सेना-प्रशासन के आला अधिकारियों के शामिल होने से भी उसके रुख को समझा जा सकता है। सवाल यह उठता है कि एफएटीएफ जैसी वैश्विक संस्थाएं सब कुछ जानते-समझते हुए भी आखिर कब तक ऐसे आंखों में धूल झोंकने वाले कदमों से संतुष्ट होती रहेंगी। भारत लंबे समय से आतंकवाद पर पाकिस्तान के दोहरे रवैये को वैश्विक मंचों पर उजागर करता रहा है, जिसे मजबूती से जारी रखना होगा।
आतंकवाद के जिस तंत्र का पाकिस्तान वर्षों से इस्तेमाल करता आया है, उसे लेकर उसकी जवाबदेही महज इनामी राशि बढ़ा देने भर से पूरी नहीं हो सकती। इस्लामाबाद के लिए यह समझना जरूरी है कि एक तरफ आतंकवाद को रणनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल करने और दूसरी तरफ खुद को पीड़ित दिखाने की नीति एक साथ नहीं चल सकती। एफएटीएफ व वैश्विक समुदाय को भी इसी कसौटी पर पाकिस्तान को परखना चाहिए।