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कलयुगी कौओं की करामात

Sun, 11 Oct 2015 07:54 PM IST
अभिषेक मेहरोत्रा
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पितरों के तर्पण के लिए भोजन ग्रहण करने आए पंडित जी ने दो पूड़ी-सब्जी निकालकर हाथ में रखी और बोले, इन्हें कौआ महाराज को ग्रहण कराइए। अपुन छत पर गए और कौओं को ढूंढने लगे, क्योंकि जब ये भोजन ग्रहण करेंगे, तभी तो हमारे पितरों का तर्पण होगा। पर जब काफी इंतजार के बाद छत पर कौए नहीं दिखे, तो हम थक-हारकर नीचे आए और पंडितजी से बोले कि कौआ तो दिख नहीं रहा।
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पंडित जी ने तुरंत अपना मोबाइल लगाया, लल्लू, नेताजी के घर कौआ लेकर आ जा। हम चौंक गए, पंडित जी, कौआ कहां से मंगा रहे हो? पंडित जी बोले, आप जैसे यजमानों के लिए वीवीआईपी व्यवस्था भी है। कनागत शुरू होते ही चार कौए गांव से मंगवाते हैं, फिर आप जैसों की सेवा कर उन्हें गांव भेज देते हैं।

थोड़ी देर में लल्लू पिंजरे में कौआ लेकर आ गया। हमने दो पूड़ी उसके सामने रख दी। पर कौआ महाराज ने उसे देखा भी नहीं। पंडित जी बोले, अरे यजमान, आप भी बड़े भोले हैं। क्या कभी किसी मंदिर की वीवीआईपी लाइन में नहीं गए हैं? अब जब गांव से प्रवासी कौआ पधारा है, तो इसकी कुछ सेवा-पानी कीजिए। यह सुनकर हमने दस का एक नोट उसके सामने रख दिया। पर कौआ हमारी ओर मुड़ा ही नहीं। इस पर लल्लू बोला, अंकल, आप लोगों के पूर्वजों के श्राद्ध के चलते ये कौए लंच में पूड़ी-कचौड़ी खाते हैं, और रात की डाइट में सिर्फ मैकडी का पिज्जा खाते हैं, ताकि तेल-घी के खाने से दूर रहते हुए अपना वजन कंट्रोल में रख सकें। इसलिए इनके सामने तो आप गांधी जी की फोटो वाला हरा वाला नोट रख दीजिए, फिर देखिए, कैसे ये आपकी पूड़ियों पर चोंच मार आपको और आपके पूर्वजों को तृप्त कर देंगे। हमने ऐसा किया और तुरंत कौआ महाराज ने हमारी पूड़ियों पर चोंच मारकर हमें आशीर्वाद दिया।
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हमने भी सोचा कि यही है कलियुग, जहां कौए भी गांधी जी की आड़ में काम निपटाने में निपुण हो गए हैं। इतने में पंडित जी के मोबाइल पर फोन आया, तो लल्लू कौए का पिंजड़ा उठा दूसरे यजमान के घर चलता बना।
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