कलम का चलन तो रहा नहीं, बड़े दिनों बाद बंदे की उंगलियां कंप्यूटर के की-बोर्ड पर चल रहीं हैं। क्रिकेट और सिनेमा की विधा में इसे ‘कमबैक’ कहा जाता है। साहित्य में ऐसा कुछ नहीं होता। वैसे भी बंदा उस कैटगरी का साहित्यकार नहीं, कि इस रचना के छपते ही इतना भाव मिले जैसा हरिवंश राय बच्चन की पौत्र-वधू को अपना जज्बा दिखाने पर मिल रहा है। अब नहीं लिखा, तो नहीं लिखा। यह भी हो सकता है कि लिखा हो और छपा न हो। खैर, जो परदे में है, उसका परदे में ही रहना फायदेमंद है।
राजनीति में अलग तरह के पाखंड होते हैं। चुनाव मे टिकट मिल जाए, तो कहा जाता है कि हाई कमान का आदेश और जनता के आग्रह के कारण कूद पड़ा मैदान में। न मिले, तो अंतरात्मा की आवाज की दुहाई दी जाती है। मगर साहित्य में ऐसा कुछ नहीं चलता। संपादक क्यों आग्रह करने लगे कि कुछ लिखिए। सो अज्ञातवास के इन दिनों को साहित्य की ठोस जमीन पर टिके एकमात्र यशस्वी अनुज-मित्र ने नोटिस लिया और गुहार लगाई, बहुत दिन हो गए आपको पढ़े। आज यह रचना देखकर वह जरूर खुश होगा।
बंदा कम से कम उन साहित्य-सेवियों की श्रेणी मे तो आता ही है, जिन्हें पुरस्कार के बनिस्बत तिरस्कार अधिक मिले। अब तिरस्कार ‘लौटाने’ की वस्तु तो है नहीं। देह भले छूट जाए, वह तो चिपका रहेगा अजर अमर-आत्मा के साथ। उस तथाकथित आत्मा की आवाज पर ही सूरदास-युग के पंछी की भांति इधर-उधर भटक कर आज फिर कंप्यूटर की-बोर्ड से खेल रही हैं उंगलियां।
खैर, समस्या यह है कि लिखें किस पर। क्या लिखें उन पर, जो नित नए जुमले गढ़ते हैं या उन पर, जिन्हें अलंकरण और विशेषणों पर विशारद हासिल है? व्यंग्य के साथ दिक्कत यह है कि यह शरीफ लोगों पर लिखे जाते हैं, जोकरों पर नहीं। और जब सब कुछ मजाक हो गया हो, तो यह अकिंचन अदना-सा व्यंग्यकार क्या करे? प्रभुजी मेरी लाज रखो।