एक गर्म दोपहरी के दिन एक किसान बांसों के झुरमुट में बनी हुई बौद्ध भिक्षु अनंगपाल की कुटिया के पास रुका। उसने भिक्षु को एक वृक्ष के नीचे बैठे देखा। उनके चेहरे पर पसरे तेज को देखकर किसान उनके पास पहुंच गया। उसने भिक्षु से अपने हालात के बारे में कहा कि खेती की हालत बहुत बुरी है, और यही हाल रहा, तो उसका गुजारा कठिन है।
किसान की चिंता देखकर भिक्षु अनंगपाल ने कहा, तुम्हें चाहिए कि तुम पत्थरों को पानी दो। किसान ने भिक्षु से इस बात का अर्थ पूछा, तो भिक्षु ने एक कहानी सुनानी शुरू की-एक किसान किसी भिक्षु की कुटिया के पास से गुजरा। उसने देखा कि वह एक बाल्टी में पानी ले जा रहे थे।
किसान ने उनसे पूछा कि वह पानी कहां ले जा रहे हैं। भिक्षु ने किसान को बताया कि वह पत्थरों को पानी देते हैं, ताकि एक दिन उन पर वृक्ष उगें। किसान को यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ, पर वह आदर प्रकट करते हुए वहां से मुस्कराते हुए चला गया।
बौद्ध भिक्षु प्रतिदिन पत्थरों को पानी देते रहे। कुछ दिनों के बाद पत्थरों पर काई उग आई। फिर काई में बीज आ गिरे और अंकुरित हो गए। उसके बाद उस पर हवा में उड़ती हुई धूल-मिट्टी भी जमा होने लगी। धीरे-धीरे वहां जमीन-सी तैयार हो गई। उस जमीन पर कुछ दिनों मे जंगली बेल फैलने लगी। इस काम में तीन-चार साल का वक्त जरूर लगा, पर वहां एक खेत तैयार हो गया।
यह कहानी सुनकर किसान ने कौतूहल से पूछा, क्या यह कहानी सच है? भिक्षु अनंगपाल ने उस वृक्ष की ओर इशारा किया, जिसके नीचे थोड़ी देर पहले वह बैठे थे। वह पेड़ खेत की मेड़ पर लगा हुआ था। किसान भी वहीं बैठ गया और उस कहानी पर मनन करने लगा।