सुख कभी अकेला नहीं आता, वह अपने साथ-साथ संताप, दुख, पीड़ा, कुंठा और भय को भी लिए आता है। भय भी अकेला नहीं, बल्कि हिंसा को आमंत्रित करता हुआ आता है। फिर भी अगर आप इसी ढंग से जीना चाहते हैं, तो जिएं। सारा संसार इसी तरह जी रहा है। लेकिन अगर आप दुख से मुक्त होना चाहते हैं, तब तो आपको सुख की पूरी संरचना को, पूरे ढांचे को समझना ही पड़ेगा। अगर हम सुख का पीछा कर रहे हैं, तो हम यह काम अपनी खुली आंखों से करें, यह जानते हुए कि जो मन हर समय सुख की खोज कर रहा है, वह सुख की छाया अर्थात दुख को पाए बिना नहीं रहेगा। और विडंबना यही है कि हम सुख के पीछे भागते हैं, और साथ-साथ दुख से बचने की कोशिश भी करते हैं।
चार चरणों से होकर सुख जन्म लेता है- देखने की क्रिया, संवेदना, संपर्क और इच्छा। कल्पना कीजिए, आपने एक सुंदर-सी मोटर कार देखी। इसे देखने से तत्काल आपके भीतर एक संवेदन, एक प्रतिक्रिया होती है। तब आप इसे छूकर देखते हैं या आप अपनी कल्पना में ही इसको स्पर्श करने का प्रयास करते हैं। फिर आपके भीतर यह इच्छा पैदा होती है कि आप भी ऐसी कार के मालिक होते और इसमें बैठकर दुनिया को दिखाते फिरते। मैं इन चीजों को देखते हुए तीव्र आनंद और आह्लाद से भर जाता हूं, और जब मैं इस तरह उन्हें देख रहा होता हूं, तो वहां ‘देखने वाला’ नहीं बचता। जो बचा रह जाता है, वह है निपट सौंदर्य- अर्थात प्रेम! एक क्षण के लिए मैं अपनी सारी समस्याओं, चिंताओं और विपदाओं सहित विदा हो जाता हूं, और बची रह जाती है सौंदर्य से सराबोर वह चीज, वह दृश्य। अब या तो मैं इसे हर्ष और उल्लास से भरकर देखूंगा और अगले क्षण भूल जाऊंगा, अन्यथा यहीं पर मन अपनी टांग अड़ाएगा और समस्याएं शुरू हो जाएंगी।
मन ने जो कुछ अभी देखा है, उस संबंध में सोच-विचार करेगा और कहेगा- वाह, कितना सुंदर था यह! फिर मैं अपने को समझाऊंगा अहा, कितना मजा आएगा, अगर मैं पुनः कई बार आकर इसे देखूं! यहीं पर विचार का हस्तक्षेप और उसकी हुकूमत शुरू हो जाती है। विचार तुलना करने लगता है, निर्णय करने लगता है, तो आपने देखा न, एक अनुभूति जो आपको एक क्षण के लिए सहज आनंद से भर गई थी, कैसे विचार की चपेट में आ जाती है, और तब विचार इस अनुभूति के सातत्य को बनाए रखना चाहता है।