साहित्य की दुनिया में कुछेक महत्वाकांक्षी लेखक आज किताब छपवाने और साहित्य जगत में प्रतिष्ठित होने के लिए नामचीन आलोचक अथवा सीनियर साहित्यकार से भूमिका लिखवा लेने का यथार्थवादी रास्ता पकड़ते हैं।
एक लेखक अगर अपनी कृतियों के बूते प्रसिद्ध बनना चाहे, तो संभव है कि पूरी उम्र गुजर जाए। ऐसे लेखक भवभूति की तरह जीवन भर अपने साहित्य का लोहा नहीं मनवा पाएंगे।
अच्छा है कि आज के साहित्यकार भवभूति होने को तैयार नहीं हैं। इसीलिए उम्र के तीसवें वसंत तक पहुंचते-पहुंचते आज का लेखक इतना चर्चित होने लगता है कि पुरस्कारों के बोझ से लदा हुआ आत्मकथा लिखने की सोचता है।
ऐसा तो नहीं कह सकते कि तमाम चर्चित साहित्यकार पव्वे के बल पर वहां पहुंचे हैं। लेकिन अगर कुछ ने ऊपर उठने के लिए किसी तजुर्बेकार का सहारा ले ही लिया, तो क्या गलत कर दिया! बच्चा खड़े होने, फिर चलना सीखने के लिए बड़ों के हाथों, तिपहिया या वॉकर का सहारा लेता ही है।
किताब की भूमिका के लिए लोगों ने कई पद चला रखे हैं-आमुख, दो शब्द, आशीर्वचन, सम्मति, प्राक्कथन, अनुशंसा इत्यादि।
इस परिक्रमा में अनेक लाभ होते देखे गए हैं। जैसे प्रसिद्ध और बड़े प्रकाशन से छपने की संभावना, पत्र-पत्रिकाओं में 'पेड न्यूज' की तरह समीक्षार्थ भेजी गई पुस्तकों पर पॉजिटिव चर्चा कराना आदि।
इससे पाठकों में पुस्तक खरीदने की उत्सुकता इंजेक्ट होती है। इस परिपाटी द्वारा प्रकाशक में सरकारी बल्क पर्चेज की संभावना बढ़ जाती है।
पिछली सदी के काव्यशास्त्रीय युग में साहित्यकार पहले यशसे यानी यश पाने के लिए, फिर अर्थकृते यानी पारिश्रामिक-रॉयल्टी-मानदेय के वास्ते साहित्य रचते थे और उसमें कामयाब भी हो जाते थे-इस संकल्प को बनाए रखते हुए कि वे राजहंस की तरह नीर-क्षीर विवेकी हैं, किसी प्रलोभन में नहीं फंसने वाले।
वे साहित्य साधना में अर्जित गरिमा को जुगाड़ से प्राप्त पुरस्कारों से हासिल पद्म-पदवियों से दागदार नहीं होने देते थे। वह 'दाग अच्छे हैं' का व्यावसायिक युग नहीं था। उनके संस्कारों में यह संस्कृत सूक्ति आदर्श रहती थी-गंगातीरमपि त्यजन्ति मलिनम, ते राजहंसा वयम। अर्थात हम ऐसे राजहंस हैं, जो पतित पावनी गंगा के मलिन पड़े रहे तीर को भी त्यागने में तनिक देर नहीं करते।
यह अच्छा ही है कि आज के धन और यशाकांक्षी लेखक राजहंस की तरह नहीं सोचते।