भगवान ने नारद जी को आदेश दिया कि पृथ्वी लोक जाकर कुछ भक्तों के सत्कार्यों की जानकारी लाओ। मैं उनमें से सबसे प्रिय भक्त का चयन करूंगा।
नारद जी अनेक व्यक्तियों से मिले, जो घंटों भगवान की पूजा-उपासना में लगे रहते थे। उन्होंने अनेक श्रद्धालुओं से भेंट की, जो श्रद्धापूर्वक तीर्थ-सेवन कर रहे थे।
एक दिन एक गांव से वह गुजर रहे थे कि उन्होंने एक व्यक्ति को वृक्ष को सींचते हुए देखा। सिंचाई के बाद वह व्यक्ति फावड़े से जमीन खोदने लगा।
नारद जी ने उससे पूछा, भैया, क्या कभी भगवान का भजन-पूजन भी करते हो? ग्रामीण बोला, महाराज, मैं भजन-पूजन कुछ भी नहीं जानता।
मैं सिर्फ यह जानता हूं कि तमाम जीव भगवान की प्यारी संतानें हैं। इसलिए मैं उन्हीं की सेवा में लगा रहता हूं। मैं पौधे रोपता हूं, उन्हें सींचता हूं, जिससे वे राहगीरों को फल तथा छाया देकर सुख प्रदान करें।
मैं तालाब खोदता हूं, ताकि वन्य पशु-पक्षी पानी पीकर तृप्त हो सकें। जब किसी रोगी या दुखी को देखता हूं, तो उसकी सेवा करने लगता हूं।
नारद जी ने उसका ब्योरा भी अपने खाते में दर्ज कर लिया। तमाम भक्तजनों के ब्योरे जब भगवान के समक्ष प्रस्तुत किए, तो भगवान ने नारद जी से कहा, देवर्षि, मेरा सबसे प्रिय भक्त तो वह ग्रामीण है, जो हर क्षण सेवा-सहायता जैसे सत्कार्यों में लगा रहता है।
पूजा-उपासना की अपेक्षा निरीह पशु-पक्षियों, गरीबों, बीमारों की सेवा-सहायता करने वाला मुझे अधिक प्रिय है।