यूरोप, दक्षिण कोरिया और जापान ने व्यापार पर वाशिंगटन की कई मांगों को स्वीकार लिया है, लेकिन भारत और ब्राजील एक अलग रास्ता इख्तियार कर रहे हैं, जो विकासशील देशों द्वारा अमेरिकी दबाव का विरोध करने के तरीके को नया रूप दे सकता है। ये देश झुकने या घबराने के बजाय प्रतिरोध कर रहे हैं, और इस दौरान उन वैकल्पिक साझेदारियों को सक्रिय करने के लिए समय निकाल रहे हैं, जो वर्षों से धीमी गति से बढ़ती रही हैं। इस प्रक्रिया को राजनीति विज्ञानी रणनीतिक हेजिंग कहते हैं। अपने अस्तित्व को बचाने की यह रणनीति ट्रंप के खिलाफ लड़ने में देशों की मदद कर रही है, लेकिन इसका दूसरा पहलू है कि यह एक अधिक खंडित और खतरनाक दुनिया का मार्ग भी प्रशस्त कर रही है।
आज वाशिंगटन अपनी विदेश नीति को सहयोगी या विरोधी के नजरिये से देख रहा है, जो उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक गलत विकल्प है। रणनीतिक हेजिंग का मतलब है कि कई तरह के अतिव्यापी रिश्ते विकसित करना, ताकि एक शक्ति पर अति-निर्भरता रोकी जा सके। इसे पोर्टफोलियो रणनीति के भू-राजनीतिक संस्करण के रूप में देखें। निवेशक जोखिम को परिसंपत्तियों में बांटते हैं, उसी तरह राष्ट्र संबंधों में निर्भरता को फैलाते हैं। इसका लक्ष्य आत्मनिर्भरता तो नहीं होता, लेकिन कार्रवाई की स्वतंत्रता को बनाए रखना जरूर होता है। क्योंकि, जब विकल्प मौजूद होते हैं, तब कोई एक मनमानी शर्तें तय नहीं कर सकता। भारत और ब्राजील को इस नजरिये को अपनाए दशकों हो गए हैं। 1990 के दशक के दौरान जब वाशिंगटन अपनी एकध्रुवीयता के आनंद ले रहा था, तब भी ये देश अमेरिकी सत्ता के प्रति गहरे अविश्वास के चलते शांतिपूर्वक दूसरे देशों के साथ रिश्ते बना रहे थे। जब इन देशों ने देखा कि जो मुद्दे अमेरिका को पसंद नहीं, उन पर उसने बात करना बंद कर दिया है, खुद को अंतरराष्ट्रीय नियमों से भी मुक्त कर लिया है और नियमाधारित व्यवस्था का यही अर्थ मान लिया है कि नियम अमेरिका के होंगे, जो सभी पर बाध्य होंगे। इसका यह अर्थ नहीं कि अमेरिका दुष्ट देश है, आखिर उदार देश भी तो शक्तियों का दुरुपयोग करते हैं, बल्कि यह है कि अमेरिका पर भरोसा नहीं कर सकते। आज इन देशों को अपने संदेह सच साबित होते दिख रहे हैं।
ट्रंप के टैरिफ के मद्देनजर ब्राजील के निर्यातक अफ्रीका, यूरोप, मध्य पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया में साझेदारी बढ़ा रहे हैं। भारतीय कंपनियां दुनिया भर के बाजारों में अपने उत्पादों के लिए प्रमाणन और नियामक मंजूरी लेने की प्रक्रिया में तेजी ला रही हैं। दोनों देशों की सरकारें वाशिंगटन को दरकिनार करते हुए व्यापार समझौतों की अपनी खोज को गति दे रही हैं, जो अमेरिकी बाजारों के आदर्श विकल्प भले न हों, लेकिन अमेरिका के आगे झुकने से बचने के लिए काफी हैं।
हालांकि, रणनीतिक हेजिंग आसान नहीं है। इसके लिए एक बड़ी संख्या में व्यापारिक साझेदारों को ढूंढना तो जरूरी होगा ही, इसके साथ उनका उपयोग करने की घरेलू क्षमता का विकास भी होना चाहिए। क्रोनी-कैपटलिज्म, असमानता और व्यापक भ्रष्टाचार वैश्विक दक्षिण के देशों के व्यापार की गुणवत्ता को सीमित करते हैं। नए बाजारों की ओर रुख करना आसान है, लेकिन उन बाजारों को आपके उत्पाद आकर्षक भी तो लगें। निस्संदेह, हेजिंग, कुछ कमियों के बावजूद, आत्मसमर्पण से बेहतर है। भारत और ब्राजील यह प्रदर्शित कर रहे हैं कि उभरती शक्तियां बाहरी दबाव और कुछ आंतरिक कमियों के बावजूद अपनी साख बचाए रख सकती हैं। इंडोनेशिया से लेकर दक्षिण अफ्रीका और तुर्किये से लेकर फिलीपीन तक विभिन्न देशों की इस स्पर्धा पर बारीक नजर है, लेकिन इनके पास प्रतिरोध का कोई मॉडल नहीं है।
भारत और ब्राजील यह दिखा रहे हैं कि अगर आप जमीनी तौर पर मजबूत हैं, तो रणनीतिक हेजिंग तमाम दबावों के बावजूद कामयाब हो सकती है। ये देश अपने प्रतिरोध को अमेरिका-विरोध के बजाय संप्रभुता के पक्ष में एक प्रभावी तर्क के रूप में प्रस्तुत करने में कामयाब रहे हैं। वाशिंगटन का दबाव तो कब नहीं रहा, लेकिन दशकों से इन देशों ने कूटनीतिक दरवाजे खुले रखे हैं, जिसका ही नतीजा है कि द्विपक्षीय रिश्ते कम से कम अब तक तो बचे ही हैं। इस दृष्टिकोण में जोखिम भी है। दुनिया की कई सबसे उन्नत तकनीक, वित्तीय और सुरक्षा प्रणालियां अब भी अमेरिकी नेतृत्व वाले नेटवर्क से चलती हैं। भारत सेमीकंडक्टर निर्माण और रक्षा क्षेत्र में अमेरिका के साथ अपने सहयोग को गहरा कर रहा है, जबकि ब्राजील कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भर है। सभी विकल्प खुले रखना अनिर्णय की स्थिति की तरह भी लग सकता है। बाजार को हेजिंग नहीं भाती, क्योंकि इससे मुद्राएं हिल सकती हैं।
अगर भारत और ब्राजील ट्रंप को मुंहतोड़ जवाब दे पाए, तो अन्य देश भी अपनी हेजिंग रणनीतियां विकसित करने को उन्मुख होंगे। इससे वैश्विक व्यवस्था में जो अव्यवस्था आएगी, वह भी बीसवीं सदी के शुरुआती दौर वाली अव्यवस्थित बहुध्रुवीय व्यवस्था के विपरीत काफी हद तक नियंत्रित ढंग से ही आएगी। भारत और ब्राजील समझते हैं कि सभी पक्षों के साथ खेलने का मतलब है कि किसी पर भरोसा न करना। लेकिन एकाधित्य वाली व्यवस्था के विध्वंस के लिए यह खतरा तो उठाना ही होगा।
अमेरिका के लिए भी यह कोई कम गंभीर स्थिति नहीं है। ट्रंप का हर मनमाना आदेश दुनिया के लिए एक सबक है कि अमेरिका पर निर्भरता कितनी खतरनाक हो सकती है। हालांकि, यह स्थिति किसी के लिए अच्छी नहीं होगी। आपूर्ति शृंखलाएं टूटेंगी, तो अमेरिका महंगाई का प्रकोप झेलेगा। डॉलर के विशेषाधिकार डांवाडोल होंगे। दुनिया ज्यादा गरीब, ज्यादा अनिश्चित और संघर्षों की ओर ज्यादा प्रवृत्त होगी। हालांकि, यह अंत नहीं है। हर दौर का एक अंत होता है। वैश्विक व्यवस्था के लिए नए नियमों के लिखे जाने का समय आ गया है।
©The New York Times 2025