इसके बाद सदी के एक चौथाई दौर में वाशिंगटन और नई दिल्ली के संबंध घनिष्ठ होते गए। बढ़ता व्यापार, रक्षा और सुरक्षा में सहयोग; कृषि से लेकर बाह्य अंतरिक्ष तक हर संभव क्षेत्र को कवर करने वाले कई मिशन इस बात को रेखांकित करते हैं कि अमेरिका और भारत ने ‘इतिहास की झिझक’ को दूर कर दिया है। इसके अतिरिक्त, दोनों देशों ने क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों को लेकर हिंद-प्रशांत, क्वाड और आई2ई2 जैसे समूहों में मिलकर काम किया। एक अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसे ‘21वीं सदी का सबसे परिभाषित संबंध’ बताया था। अमेरिका ने भारत को एक प्रमुख रक्षा साझेदार घोषित किया और टी-1 का दर्जा दिया, तो भारत ने जीएसओएमआईए, एलईएमओए, सीओएमसीएएसए और बीईसीए जैसे कई मूलभूत संचार समझौतों पर हस्ताक्षर किए। भारत को जी-7 शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया गया; दोनों देश वैश्विक व्यापक रणनीतिक साझेदार बने, तो सितंबर 2023 में दिल्ली में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन में सर्वसम्मति से प्रस्ताव हासिल करने के लिए अमेरिकी सहमति जरूरी थी।
रूसी तेल खरीदने पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ लगा दिया है। लेकिन, भारत ने अमेरिका और यूरोपीय देशों के दोहरे मानदंडों को उजागर कर दिया है, क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद वे खुशी-खुशी रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं। वर्ष 2024 में यूरोपीय संघ ने रूस के साथ 67.5 अरब यूरो का व्यापार किया। यूरोपीय संघ ने रूस से न केवल ऊर्जा, बल्कि फर्टिलाइजर, खनिज उत्पाद, केमिकल, लोहा एवं इस्पात और मशीनरी एवं यातायात उपकरण खरीदे। आश्चर्य की बात तो यह है कि अमेरिका खुद रूसी यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड, पैलेडियम, फर्टिलाइजर और केमिकल का आयात कर रहा था। चीन जोर देकर कहता है कि ‘रूस सहित सभी देशों के साथ सामान्य आर्थिक, व्यापार और ऊर्जा सहयोग करना उसके लिए वैध और कानूनी है।’
भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत एरिक गार्सेटी ने मीडिया को बताया कि भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन नहीं किया है। अमेरिकी दबाव के आगे न झुकते हुए भारत सरकार ने दृढ़तापूर्वक कहा है कि अपने उपभोक्ताओं के लिए पूर्वानुमानित और सस्ती ऊर्जा सुनिश्चित करना उसका कर्तव्य है। ट्रंप द्वारा भारत को ‘टैरिफ किंग’ और उसकी अर्थव्यवस्था को ‘मृत अर्थव्यवस्था’ कहने तथा यूक्रेन में रूसी अभियानों को वित्तपोषित करने के असभ्य आरोप और धमकाने वाले लहजे से भारत नाराज है। अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही ट्रंप ने मोदी को इस उम्मीद के साथ व्हाइट हाउस आमंत्रित किया था कि भारत समझौते पर हस्ताक्षर करेगा। हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी स्पष्ट कह चुके हैं कि भारत ऐसा कोई समझौता नहीं करेगा, जिससे भारतीय किसानों, डेयरी उद्योग और मत्स्य पालन पर प्रतिकूल असर पड़े। ट्रंप को यह संदेश जरूर मिल गया होगा और उन्हें पसंद नहीं आया होगा।
ट्रंप कई बार दोहरा चुके हैं कि व्यापार का डर दिखा उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम कराया, लेकिन भारत सरकार संसद में और बाहर, उनके दावों को खारिज कर चुकी है। यही बात उन्हें नागवार गुजरी है। जब पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर आतंक के केंद्र के रूप में देखा जाता हो, तब ट्रंप का यह कहना कि वह पाकिस्तान को चाहते हैं और पहलगाम आतंकी हमले के तत्काल बाद व्हाइट हाउस में जनरल मुनीर एवं आईएसआई प्रमुख की मेजबानी करना, भारत के लिए जले पर नमक छिड़कने से कम नहीं है।
अमेरिकी टैरिफ की चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को विभिन्न देशों के साथ टीएफए (व्यापार सुविधा समझौता) को अंतिम रूप देने के अपने प्रयासों को तेज करना होगा, भारत में निर्माण प्रयासों को और बढ़ावा देना होगा, आपूर्ति के अपने स्रोतों में विविधता लानी होगी और नए बाजार तलाशने होंगे। हम पहले भी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर चुके हैं; भारत की विकास गाथा घरेलू खपत पर आधारित है, इसलिए नकारात्मक प्रभाव सीमित रहेगा। भारत को ट्रंप की धमकियों के आगे न झुकते हुए अपने पक्ष पर शांत और दृढ़ रहना चाहिए। ब्रिक्स के उन अन्य सदस्यों के साथ सामंजस्य बैठाना चाहिए, जिन पर ट्रंप ने प्रतिबंध लगाया है और डब्ल्यूटीओ शासन द्वारा समर्थित न होने वाले दंडात्मक टैरिफ के विरुद्ध एकजुट रुख अपनाना कोई बुरा विचार नहीं है।