देश भर के वैज्ञानिकों की टीमें जोशीमठ की बदलती भूगर्भीय संरचना, जमीन के अंदर अज्ञात स्रोतों से लगातार रिसते पानी, भूगर्भ में मिट्टी और पत्थरों की स्थिति, उनकी भार क्षमता और यहां के पर्यावरण और पर्वतीय संरचनाओं के रुझान की बारीकी से जांच कर रहे हैं। चूंकि सूचनाएं साझा करने पर रोक है, इसलिए तथ्य सामने नहीं आ रहे हैं। लेकिन लगभग सभी वैज्ञानिक एकमत हैं कि जोशीमठ के हालात बेहद गंभीर हैं। मिट्टी-बोल्डर मैट्रिक्स से बनी जोशीमठ की जमीन पर पहले ही जरूरत से बहुत ज्यादा वजन है। इस वजन को कम करने के लिए सारी बड़ी इमारतें एक-एक करके हटानी होंगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि इस जमीन पर पुनर्निर्माण के नाम पर नया बोझ न डाला जाए। इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर राज्य सरकार ने शहर में ड्रेनेज व सीवर के नए इंतजाम से अपने हाथ खींच लिए हैं। आपदा प्रबंधन सचिव डॉ. रंजीत सिन्हा ने साफ कह दिया है कि तमाम तकनीकी संस्थानों की जांच रिपोर्ट आने के बाद ही जोशीमठ के पुनर्निर्माण पर कोई फैसला लिया जाएगा।
जोशीमठ की जमीन में मात्र एक से 1.5 मीटर की गहराई तक मिट्टी है। वह भी खराब ग्रेड वाली रेतेली मिट्टी है। यह जमीन किसी भी शहर के लिए उपयुक्त नहीं। एक वैज्ञानिक ने बताया कि इस पर भारी-भरकम सामग्री से किसी भी शहर को बसाना खतरनाक है। यही वजह है कि एनटीपीसी, आईटीबीपी जैसे संस्थानों ने टीन व फाइबर की छत के हल्के भवन बनाए, हालांकि इनमें भी कई जगह दरारें आ गईं।
जोशीमठ की जमीन के बारे में सबसे पहले मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट (1976) में बताया गया था कि जोशीमठ की जमीन ढीले मैट्रिक्स में बड़े असंतुलित बोल्डरों से बनी हैं। यहां की पहाड़ियों में कई स्थानों पर एक के ऊपर एक बोल्डर रखे दिख जाएंगे। इन बोल्डरों के बीच की मिट्टी हट गई है, इसलिए जमीन के भीतर का नजारा साफ दिख जाता है।
नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हाइड्रोलॉजी के एक वैज्ञानिक ने बताया कि गूगल अर्थ में देखें, तो जोशीमठ सीधी ढलान पर बसा है। न जाने कितने प्राकृतिक जलस्रोत रास्ता बदल कर शहर की जमीन के नीचे बह रहे हैं, जो जमीन के अंदर की मिट्टी को लगातार काट रहे हैं। इन जलस्रोतों को खोजना व रोकना असंभव है। ड्रेनेज के लिए नई लाइनें बिछाकर बारिश या रोजमर्रा के इस्तेमाल के पानी को तो निकाला जा सकता है, मगर जमीन के नीचे अदृश्य जलस्रोत से बह रहे पानी को कैसे निकाला जा सकता है? यह अपनी तरह की एक प्राकृतिक ड्रेनेज व्यवस्था है, जो पहाड़ों पर आम है।
इन सबके बावजूद जोशीमठ के पुनर्निर्माण के मोह में फंसी राज्य सरकार केंद्र से सैकड़ों करोड़ रुपये की राहत मांग रही है, जबकि जरूरत आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित जोशीमठ के पुनरुत्थान की है। चीन सीमा के करीब होने के कारण यह पूरा इलाका सामरिक नजरिये से महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि नौवीं स्वतंत्र ब्रिगेड की गढ़वाल स्कॅाट ने जोशीमठ के ऊपरी हिस्से में हल्के भार वाले टीन शेड भवनों में डेरा डाल रखा है। यहीं पर आईटीबीपी का एक केंद्र भी है। जोशीमठ को सांस्कृतिक व सामरिक धरोहर समझ कर बचाना जरूरी है।
नया जोशीमठ बसाने के लिए राज्य सरकार ने बदरीनाथ यात्रा मार्ग पर ही चार स्थान चिह्नित किए हैं। सरकार को यहां से विस्थापित लोगों के स्थायी रोजगार और जमीनों की भी व्यवस्था करनी होगी। यह कोई मुश्किल काम नहीं है। टिहरी बांध बनने पर पुरानी टिहरी डूब गई, लेकिन नई टिहरी आज आधुनिक टाउनशिप की एक मिसाल है। वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार जोशीमठ के बारे में ठोस फैसला लेकर कोई दूरगामी नीति तैयार करे।