फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

खेती: किसान आयोग गठित करने का वक्त, कृषि विशेषज्ञों की हिस्सेदारी बढ़ाने की भी दरकार

के. सी. त्यागी
Updated Sat, 29 Jul 2023 07:48 AM IST

सार

किसानों के हित में किसान आयोग का गठन तो हो ही, कृषि मूल्य आयोग जैसे उपक्रमों में कृषि विशेषज्ञों की हिस्सेदारी भी बढ़ाई जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला


1930 के दशक में प्रेमचंद के उपन्यास गोदान में वर्णित भारतीय गांवों की दुर्दशा की परिस्थितियां आज भी मौजूद हैं। देश के लगभग सभी कृषि प्रमुख राज्यों में किसानों की आत्महत्या की जांच करना, कृषि संकट का निदान करना और वर्तमान उत्पादन केंद्रित कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति से अलग नवीन आर्थिक और प्रबंधन समाधान निर्धारित करने की आवश्यकता है। समस्या की जड़ में वैश्वीकरण व निगमीकरण के साथ उदारीकृत बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की प्रमुख भूमिका है। किसानों की आत्महत्याओं का बेहिसाब सिलसिला वस्तुत: 1995 के बाद शुरू हुआ। उससे पूर्व आपसी पारिवारिक कलह अथवा अवसाद और भयंकर रोग से ग्रस्त ग्रामीणों की आत्महत्या के समाचार ही आते थे।


राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों, व्यापारियों और उद्योगपतियों का गठजोड़ यह देखने में क्यों विफल है कि देश के कमेरे (श्रमिक) वर्ग ने सामूहिक रूप से पलायन किया है? कुल जनसंख्या में कृषक आबादी का अनुपात तेजी से घट रहा है और जो लोग अब भी अपनी खेती को बचाने के लिए ‘हल’ पकड़े हुए हैं, उनमें से 40 फीसदी पहले अवसर पर पलायन करने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।


वर्ष 2014-15 के बाद से किसानों के बीच आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ने से न केवल यह आम धारणा खारिज हुई कि किसान, संकट से उबरने की राह पर हैं, जैसी कि सरकारी विज्ञप्तियों में घोषणा होती रहती है, बल्कि यह धारणा भी खंडित हुई कि सिचाई, ग्रामीण सड़कों पर सार्वजनिक व्यय में वृद्धि और कृषि विकास व कृषि निवेश में बढ़ोतरी के लाभों से किसानों की पीड़ाएं कम हुई हैं। बंगलूरू स्थित एक अखिल भारतीय संस्था के अध्ययन से पता चला है कि संकट में मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसान हैं। आत्महत्या करने वाले किसानों की कृषि जोत के आकार से पता चला है कि मध्य प्रदेश और हरियाणा को छोड़कर सभी प्रमुख राज्यों में छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जहां आत्महत्या करने वालों में मध्यम और बड़ी जोत वाले किसानों का प्रतिशत क्रमशः 53 और 87 तक है।


एनएसएस की 77वें दौर की रिपोर्ट के अनुसार, किसानों के पास औसतन 0.512 हेक्टेयर भूमि दर्ज की गई है। देश के आधे से ज्यादा किसानों पर कर्ज है। आंध्र व तेलंगाना के 90 फीसदी से ज्यादा किसान कर्जदार हैं। हर किसान पर औसतन 2.45 लाख रुपये कर्ज है। एक रोचक तथ्य यह भी है कि उत्तर-पूर्व के राज्यों में केवल 20 फीसदी किसान ही कर्जदार हैं।


खेती-बाड़ी लगातार घाटे का सौदा साबित हो रही है। नेशनल सैंपल सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार, किसान परिवारों को फसल से औसतन महज 3,798 रुपये की मासिक आय होती है, जिसमें से 2,959 रुपये वह पहले ही फसल पर खर्च कर चुका होता है, यानी उसके हाथों में औसतन महीने में मात्र 839 रुपये ही आते हैं। लिहाजा बढ़ती अर्थव्यवस्था को स्थायी बनाए रखने के लिए समग्र विचार एवं क्रियान्वयन की आवश्यकता है।


समय की मांग है कि सभी पूर्वाग्रहों को त्यागकर एक किसान आयोग का गठन किया जाए। कृषि मूल्य आयोग जैसे उपक्रमों में कृषि विशेषज्ञों की हिस्सेदारी बढ़ाई जाए। न्यूनतम समर्थन मूल्य के मूल्यांकन का स्वरूप वैज्ञानिक हो और अन्य बाजार उत्पादों की तर्ज पर कृषि उत्पादों को निर्धारित मूल्य से कम पर न बेचने की वैधानिक चेतावनी जारी हो।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next