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गांधी के ‘स्वराज’ को याद करने का वक्त: ‘स्वराज’ की पूरी संरचना के चार स्तंभ क्या, लैंगिक असमानता पर कैसे विचार

सार

महात्मा गांधी ने दशकों पहले ‘स्वराज’ के चार स्तंभ बताए थे। उन्होंने स्वराज को जिस तरह परिभाषित किया था, आज उसे वैसे ही फिर से याद करने का वक्त है।
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महात्मा गांधी के वचन - फोटो : Ai
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विस्तार
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महात्मा गांधी के जीवन के आखिरी तीन दशक ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से भारत की आजादी के लिए संघर्ष करने में गुजरे। इस दौरान उन्होंने बहुत कम मौकों पर बताया कि वे आजाद भारत को किस रूप में देखना चाहते हैं। 1922 में उन्होंने ‘स्वराज’ को परिभाषित किया, जिसको फिर से याद करना जरूरी है। उन्होंने कहा था, 'अस्पृश्यता का उन्मूलन, खादी का निर्माण, हिंदू-मुस्लिम एकता और अहिंसा का पालन—ये वो चार स्तंभ हैं, जिन पर ‘स्वराज’ की पूरी संरचना टिकी रहनी चाहिए। अगर इनमें से किसी एक स्तंभ को हटाया तो पूरी इमारत ढह जाएगी।' उनके इस कथन को समझने की कोशिश करते हैं। 'अस्पृश्यता का उन्मूलन’ को व्यापक अर्थ में सामाजिक न्याय की स्थापना के रूप में देखा जा सकता है। इसमें केवल जातिगत भेदभाव और असमानता को दूर करना ही नहीं, बल्कि लैंगिक असमानता को खत्म करना भी शामिल है।

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कांग्रेस में उच्च जाति से आने वाले प्रमुख नेताओं, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस आदि की तुलना में गांधी इस बात को लेकर विशेष रूप से सजग थे कि अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराई भारत की स्वतंत्रता की मांग को नैतिक रूप से कमजोर करती है। वे अस्पृश्यता को ‘पाप’ मानते थे और इसे जारी रखने वालों को उन्होंने ‘हिंदू धर्म का डायर’ तक कहा था। हालांकि गांधी के सामाजिक सुधार के विचारों की अपनी सीमाएं भी थीं। उनके द्वारा इस्तेमाल किया गया ‘हरिजन’ शब्द आज संरक्षणवादी और ऊपर से दया दिखाने वाले दृष्टिकोण का प्रतीक माना जाता है और उसकी जगह अब अधिक सम्मानजनक राजनीतिक-सामाजिक पहचान के रूप में ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह, औपचारिक अर्थव्यवस्था और रोजगार के क्षेत्र में महिलाओं की व्यापक भागीदारी को लेकर गांधी का दृष्टिकोण पूरी तरह स्पष्ट या एकरूप नहीं था। फिर भी, जातिगत और लैंगिक भेदभाव के प्रति उनकी सजगता को देखते हुए कहा जा सकता है कि अपने समय के अधिकांश राष्ट्रवादियों की तुलना में गांधी इन सवालाें को कहीं अधिक गंभीरता से समझते थे।

गांधी ने ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ का महत्व अपने विदेश प्रवास के अनुभवों से समझा। अगर मुंबई में उनकी वकालत जम गई होती, तो संभव है कि उनके अधिकांश या लगभग सभी ग्राहक और मित्र हिंदू ही होते। यहां से वे दक्षिण अफ्रीका के डरबन चले गए। वहां उन्हें दो गुजराती मुस्लिम व्यापारियों के बीच चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए बुलाया गया था। उन्होंने वहां भारतीय समुदाय के सामाजिक और राजनीतिक हितों के लिए काम करना शुरू किया तो उन्होंने पाया कि पारसी, मुसलमान और तमिल समुदाय के लोग उनके सबसे भरोसेमंद और लगातार साथ देने वाले समर्थकों में शामिल थे। इन अनुभवों ने गांधी को यह विश्वास दिलाया कि स्थायी और मजबूत राष्ट्रवाद के निर्माण के लिए केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि भाषाई विविधता को स्वीकार करना भी बेहद जरूरी है।
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नवंबर 1908 में जोहान्सबर्ग की जेल से लिखे एक संदेश में गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में श्वेत शासकों के खिलाफ चल रहे भारतीय आंदोलन के बारे में कहा था, 'यह आंदोलन हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, बंगाली, मद्रासी, गुजराती, पंजाबी और अन्य किसी तरह के भेदभाव को नहीं मानता। हम सभी भारतीय हैं और भारत के लिए लड़ रहे हैं।’

अगले महीने जेल से रिहा होने के बाद जोहान्सबर्ग में भारतीयों की एक सभा को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा कि यदि हिंदू और मुसलमान रूपी दोनों आंखें सुरक्षित और स्वस्थ रहेंगी तो आप समृद्ध होंगे। उन्होंने आगे कहा कि यदि दोनों समुदाय एकजुट रहेंगे तो भारत के भविष्य के निर्माण में उनकी निर्णायक भूमिका होगी। भारत लौटने के बाद गांधी ने इन्हीं विचारों को अपने सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक विचारधारा का आधार बनाया। हालांकि, धार्मिक सद्भाव कायम रखने के लिए उन्होंने बहुत मेहनत की, लेकिन वे विभाजन को रोक नहीं सके।

हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रति गांधी की यह प्रतिबद्धता आखिरकार उनके जीवन पर भारी पड़ी। जब उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे पर मुकदमा चला तो इस ऐतिहासिक मुकदमे को करीब से देखने वालों में मुंबई के संपादक डीएफ कराका भी थे। अक्तूबर 1949 में 'द करंट' में प्रकाशित एक लेख में कराका ने लिखा कि लाल किले के परिसर में लंबे समय तक चले मुकदमे के दौरान यह स्पष्ट था कि गोडसे कोई मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति नहीं था। उनके अनुसार, वह एक शांत और सोच-समझकर राजनीतिक उद्देश्य के लिए काम करने वाला व्यक्ति था और आरएसएस की विचारधारा में विश्वास रखता था।

आखिर में स्वराज के चौथे स्तंभ पर आते हैं, ‘अहिंसा का पालन या उसका निरंतर अभ्यास।’ जिस तरह हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के मामले में गांधी ने अपने सार्वजनिक जीवन के शुरुआती दौर में ही अपनी सोच विकसित कर ली थी, उसी तरह अहिंसा के प्रति उनकी आस्था भी बहुत पहले दृढ़ हो चुकी थी और आखिर तक बनी रही।

1909 में गर्मी के दिनों में गांधी दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों के अधिकारों के पक्ष में ब्रिटेन में पैरवी करने के लिए लंदन गए थे। लंदन पहुंचने से कुछ ही समय पहले एक चाय पार्टी में ब्रिटिश अधिकारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हत्यारा एक युवा भारतीय था और जिस अधिकारी की हत्या हुई, वह उस आयोजन में आमंत्रित अतिथि के रूप में शामिल हुआ था।

इस घटना से गांधी बेहद व्यथित हुए। उन्होंने लिखा, ‘यदि ऐसी हत्यारी कार्रवाइयों की वजह से ब्रिटिश भारत छोड़ भी दें, तो उनकी जगह शासन कौन करेगा? इसका एक ही उत्तर है-हत्यारे। भारत को हत्यारों के शासन से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता, चाहे वे काले हों या गोरे।’

गांधी का मानना था कि दुनिया सशस्त्र क्रांतियों से ऊब चुकी है। उनका कहना था कि वे उन वीर और बलिदानी क्रांतिकारियों के सामने अहिंसा के रास्ते पर खड़े होने में बिल्कुल संकोच नहीं करते, क्योंकि उनके पास भी उतनी ही मात्रा में साहस और बलिदान की शक्ति रखने वाले अहिंसक स्त्री-पुरुषों के उदाहरण मौजूद हैं- ऐसा साहस और बलिदान जो निर्दोष लोगों के खून से कलंकित नहीं है।

अब सवाल यह है कि गांधी द्वारा स्वराज के लिए बताए गए ये चार स्तंभ लगभग एक सदी बाद कितने मजबूत दिखाई देते हैं? गांधी ने खुद कभी विस्तार से यह नहीं बताया कि एक स्वतंत्र भारतीय राज्य के नागरिकों के प्रति क्या कर्तव्य और जिम्मेदारियां होनी चाहिए। अहिंसा के प्रति प्रतिबद्धता वाले उन आंदोलनों को वे सराहते, जिनमें नागरिकों ने बिना हिंसा का सहारा लिए अपने अधिकारों और मांगों के लिए आवाज उठाई। इनमें नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हुए प्रदर्शन, किसानों का आंदोलन, पर्यावरण आंदोलन और हाल में हुआ छात्र आंदोलन शामिल है। दलितों और महिलाओं के लिए समान अधिकार, अल्पसंख्यकों के लिए समान अधिकार, ऐसी आर्थिक व्यवस्था जो न्यायपूर्ण होने के साथ-साथ टिकाऊ भी हो, ये सभी आज भी स्वतंत्रता की बुनियादी शर्तें हैं। लेकिन आज के भारत में इन चारों स्तंभों पर दबाव दिखाई देता है। गांधी ने जिस ‘स्वराज’ की संरचना की कल्पना की थी, वह अभी पूरी तरह ढही नहीं है। लेकिन यह कहना भी मुश्किल है कि वह संरचना आज उतनी मजबूत और स्थिर है, जितनी एक आजाद और न्यायपूर्ण समाज के लिए होनी चाहिए।

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