राजनेताओं की कुछ बातें हम राजनीतिक पंडित भी नहीं समझ पाते। सो पिछले सप्ताह जब पहली बार कश्मीर घाटी में शहीद कश्मीरी सैनिकों के जनाजों में ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारे सुनाई दिए, तो मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि भारत को कश्मीर समस्या का समाधान ढूंढने के लिए पाकिस्तान से बातचीत करनी चाहिए। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि उनके इस वक्तव्य के बाद शायद उनको देशद्रोही कहा जाएगा, लेकिन कश्मीर में शांति लाने के लिए वह इस अपमान को भी सहने के लिए तैयार हैं।
आपको देशद्रोही कौन कहेगा! क्या प्रधानमंत्री ने स्वयं बार-बार नहीं कहा है कि वह पाकिस्तान के साथ अमन-शांति चाहते हैं? क्या उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही नवाज शरीफ को शपथ ग्रहण समारोह में बुलाकर दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाया था? इसके बाद उन्होंने काबुल से दिल्ली लौटते समय अमन-शांति की इसी खोज में लाहौर में कुछ घंटे नहीं बिताए थे? सो आपको कोई देशद्रोही तो नहीं कहने वाला, लेकिन नासमझ कहने वाले बहुत लोग होंगे। इसलिए कि जब से आपने अपने पिता के देहांत के बाद जम्मू-कश्मीर की सत्ता संभाली है, तब से कई बार साबित किया है कि न आप शासन के तरीके समझती हैं, न ही अब तक यह समझ पाई हैं कि हर बार अमन-शांति के रास्ते में बाधाएं किस तरफ से डाली गई हैं। सरकार चलाने की समझ होती, तो अपने कार्यकाल के इतने महीने आपने पत्थरबाजों के हवाले न किए होते।
रही बात भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत का सिलसिला दोबारा शुरू करने की, तो क्या श्रीनगर से आपको दिखता नहीं कि बातचीत के रास्ते में कितने रोड़े हैं? पहली समस्या यह है कि केंद्र सरकार बातचीत करे, तो किसके साथ। एक समय हम जैसे लोग सुझाव दिया करते थे कि बातचीत तब मतलब रखेगी, जब हम पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष से ही बातचीत करेंगे, क्योंकि हम जानते हैं कि विदेश नीति और खास तौर पर भारत से संबंधित नीति कभी भी पाकिस्तान के चुने हुए प्रधानमंत्री के हाथों में नहीं रही है। उदारवादी कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों ने दशकों से यही गलती की कि चुने हुए प्रधानमंत्रियों से बातें कीं, जबकि पाक सेनाध्यक्ष युद्ध की तैयारियां करते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी ने परवेज मुशर्रफ से बातें करने की कोशिश यह जानते हुए भी की कि कारगिल युद्ध के खलनायक वही थे। बातचीत नाकाम रही, पर कम से कम मुशर्रफ ने आगरा आकर खुलकर स्वीकार तो किया कि जब तक कश्मीर का मसला हल नहीं होता, तब तक जेहादी आतंकवाद का सिलसिला बंद नहीं हो सकता।
हाल में मुशर्रफ ने स्वीकार किया कि उनकी नजरों में हाफिज सईद आतंकवादी नहीं, हीरो हैं। क्यों न हो, जब पाक सेना ने ही सईद जैसों को पैदा किया है। लेकिन आज भारत की समस्या यह भी है कि ऐसा लगने लगा है, जैसे जेहादी राक्षस अब पाक सेना के काबू में नहीं हैं। याद रखिए कि जेहादी संस्थाओं ने पाक सेना के अड्डों पर बहुत बार हमले किए हैं और इस्लामाबाद पर भी चढ़ाई की है। सो आज अगर नरेंद्र मोदी बातचीत का सिलसिला शुरू करते हैं पाक सेनाध्यक्ष के साथ, तो हो सकता है कि बातचीत बेकार जाए, क्योंकि पाकिस्तान की जमीन से जेहादी भारत में आतंक फैलाने आते रहेंगे, क्योंकि जेहादी संस्थाएं अब अपने बल पर चलने लग गई हैं। सो महबूबा जी, अब जब कश्मीर घाटी में ‘पाकिस्तान मर्दाबाद’ के नारे गूंजने लग गए हैं, तब कश्मीर में सुशासन और खुशहाली लाकर अमन-शांति लाने का काम आप ही बेहतर कर सकती हैं।