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मजहबी कट्टरता से पार पाने का समय

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इसलाम-विरोधी अमेरिकी फिल्म के विरोध में पाकिस्तान में प्रदर्शन और हिंसा रुकी नहीं है। सरकार ने लोगों से शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपील की थी, पर वह अपील दरकिनार कर दी गई। वाणिज्यिक राजधानी कराची में सबसे ज्यादा हिंसा भड़की। कई जगहों पर सरकारी और गैर-सरकारी संपत्ति को आग लगाई गई। दूसरी तरफ विरोध प्रदर्शन में शामिल न होने पर एक कारोबारी नेता के खिलाफ 'ईशनिंदा’ कानून के तहत मामला दर्ज किया गया।
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दरअसल पाकिस्तान के बहुसंख्यक समुदाय में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो ऐसे प्रदर्शनों को बेमानी समझते हैं, क्योंकि इसलाम का मतलब शांति है। उनका मानना है कि नफरत फैलाने वाले एवं मतभेद पैदा करने वाले इसलामी कानूनों को खत्म किया जाए।

पाकिस्तान में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं, जो चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन कोई ऐसा कानून बनाएं, ताकि सारी दुनिया में नफरत फैलाने वाली फिल्मों, कार्टूनों आदि पर प्रतिबंध लग सके। पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भी इसका समर्थन किया है। इसलामी देशों का संगठन ओआईसी भी ऐसे कानून बनाने की पिछले कई वर्षों से मांग कर रहा है।
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सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि पाक में ईशनिंदा कानून को खत्म किया जाए या उसमें संशोधन करके यह सुनिश्चित किया जाए कि इसका दुरुपयोग कोई न कर सके। मानवाधिकारों की रक्षा करने वाली राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी इस कानून का विरोध कर रही हैं। पाकिस्तान की कोई भी सरकार इस कानून में तबदीली करने का साहस नहीं जुटा सकी।

इसके पीछे दलील यह दी जाती है कि चूंकि इसलाम हमारा मजहब है, इसलिए कानून में ऐसे संशोधन से भावनाओं को चोट पहुंचेगी। जबकि सचाई यह है कि ईशनिंदा कानून का दुरुपयोग अल्पसंख्यक ईसाई, हिंदू, सिख, बौद्ध और अहमदिया समुदाय पर झूठे मुकदमे चलाने के लिए किया जा रहा है। इसके तहत अधिकांश शिकायतें बदला लेने की भावना से दर्ज कराई जाती हैं।

कभी निर्दोष मुसलमान भी इसकी लपेट में आ जाते हैं, जिनमें शिया प्रमुख हैं। ईशनिंदा कानून के तहत लोगों को कुरान और पैगंबर या इसलाम धर्म की अवमानना के लिए दंडित किया जाता है। जबकि मोटे तौर पर इसका कोई साक्ष्य नहीं होता कि किसने कैसे अवमानना की। आरोपी का साथ पुलिस और खुफिया एजेंसियां देती हैं। अल्पसंख्यक समुदाय का साथ देने वाले न्यायाधीश कट्टरपंथियों के निशाने पर आ जाते हैं।

पंजाब प्रांत के पूर्व गवर्नर सलमान तासीर की हत्या इसलिए की गई थी, क्योंकि उन्होंने उस बूढ़ी ईसाई महिला का बचाव किया था, जिसके खिलाफ इसलाम की अवमानना का आरोप था। हाल ही में इसलामाबाद के निकट की एक बस्ती से पवित्र धर्मग्रंथ के पृष्ठों को आग लगाने के आरोप में चौदह साल की एक ईसाई किशोरी रिम्सा मसीह को गिरफ्तार किया गया था।

बस्ती की मसजिद के इमाम ने यह आरोप लगाया था, जो बाद में गलत साबित हुआ। गवाह ने गवाही के दौरान दावा किया कि इमाम की कोशिश थी कि रिम्सा का परिवार उनके पड़ोस का इलाका छोड़ कहीं और चला जाए। आजकल रिम्सा और उसके परिवार को सरकार ने किसी अज्ञात जगह पर शरण दी है, क्योंकि उनकी जान पर खतरा है।

सरकार रिम्सा और उसके परिवार वालों की जान बचाने के लिए उन्हें देश से बाहर भी भेज सकती है। रिम्सा की बस्ती से अनेक ईसाई परिवार पहले ही पलायन कर चुके हैं। पाकिस्तान में हिंदू और सिखों को भी तरह-तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है। वे धार्मिक वीजा लेकर भारत आने के बाद वापस नहीं जाना चाहते।

अंतरराष्ट्रीय कानून बनाने का प्रस्ताव तो अपनी जगह है, लेकिन सबसे पहले इसलामाबाद को ईशनिंदा जैसे कानूनों में सुधार लाने के लिए जरूरी संशोधन करना चाहिए, ताकि अल्पसंख्यक समुदायों पर इस कानून की आड़ में जो अत्याचार हो रहे हैं, वे बंद हो जाएं और उन्हें दूसरे दरजे का नागरिक न समझा जाए। विश्व बिरादरी और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों को भी चाहिए कि वे पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा के लिए सरकार पर सुरक्षा बंदोबस्त कड़ा करने के लिए दबाव बनाएं।
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