पहले भी अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की जरूरत को ध्यान में रखते हुए सुझाव आते रहे हैं। विधि आयोग वर्ष 1958 और वर्ष 1978 में दो अलग-अलग संस्तुतियों के माध्यम से इसके लिए सुझाव दे चुका है। आयोग का मत था कि इससे अदालतों में लंबित मुकदमों के समयबद्ध निस्तारण में आसानी होगी, न्यायिक-संरचना अधिक पारदर्शी तथा क्रमबद्ध हो जाएगी और उसके परिणामस्वरूप मुकदमों का तेजी से निपटारा होगा और आम लोगों का उन पर भरोसा बढ़ेगा। संसद की 'लोक शिकायत, कानून तथा न्याय की स्थायी समिति' ने भी वर्ष 2006 में इस विषय पर सुझाव दिया था। इसके अलावा, इस समिति ने एक मसौदा भी तैयार किया था, किंतु वह आगे नहीं बढ़ पाया।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई मौके पर इस संबंध में सुझाव और निर्देश दिया था। सबसे पहले वर्ष 1992 में 'ऑल इंडिया जजेज एसोसिएशन बनाम भारत संघ' में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के लिए जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया था। उसके बाद फिर वर्ष 1993 में इस पर जरूरी पहल करने की जिम्मेदारी सरकार के विवेक पर छोड़ दी गई। फिर 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय का स्वतः संज्ञान लेते हुए न्यायाधीशों के चयन के लिए एक केंद्रीय व्यवस्था के निर्माण करने का सुझाव दिया, किंतु अब तक इस पर कोई ठोस पहल नहीं की जा सकी है। लोकशाही में उसके सभी उपांगों की विश्वसनीयता उनकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। अदालतों के मामले में तो यह अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यह उनकी एकमात्र पूंजी होती है। जनता के बीच उनकी साख और आम लोगों के मन में उसके प्रति सम्मान ही उसकी ताकत की गंगोत्री होती है। इसलिए उन्हें अपेक्षाकृत अधिक सजग रहने की जरूरत होती है।
मुकदमों का अंबार, उनके निस्तारण में देरी तथा पारदर्शिता से जुड़ी अपेक्षाएं न्यायपालिका की साख को सबसे अधिक प्रभावित कर रही हैं। पारदर्शिता के प्रति आग्रही समाज में गैर-जरूरी गोपनीयता कई बार अविश्वास के काल्पनिक कारणों तथा आधारों को तैयार करने की पृष्ठभूमि बनाता है। कॉलेजियम व्यवस्था की गोपनीयता के कारण अब उन पर भी प्रश्न उठने लगे हैं। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के कुछ वर्तमान न्यायाधीशों ने भी उस पर सवाल उठाए हैं। ये सभी तथ्य ऐसे हैं, जो अखिल भारतीय न्यायिक सेवाओं के पक्ष में पर्याप्त आधार तैयार करते हैं।
न्यायपालिका के अखिल भारतीय सेवा के पक्ष में यह कहा जा रहा है कि यह पूरे देश के लिए एक ऐसी पारदर्शी चयन प्रक्रिया होगी, जिसमें प्रतिभाशाली युवाओं को मौका मिलेगा। इसमें समाज के सभी वर्गों तथा महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा। चूंकि यह चयन राष्ट्रीय स्तर पर होगा, इसलिए इसमें सबसे अच्छे लोगों के चयन की एक परंपरा विकसित होगी। मुकदमों की बढ़ती संख्या का एक कारण यह भी है कि हमारे यहां न्यायाधीशों की बहुत कमी है। अमेरिका में जहां हर 10 लाख आबादी पर 107 न्यायाधीश हैं, वहीं हमारे यहां इतनी आबादी पर मात्र 21 न्यायाधीशों के पद ही सृजित हैं। अलग-अलग राज्यों में उनके चयन की प्रक्रिया में अक्सर देरी होती रहती है, जिसके कारण कुल 25,246 स्वीकृत पदों के सापेक्ष केवल 19,858 न्यायाधीश ही कार्य कर रहे हैं। नेशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम की रिपोर्ट के अनुसार, मुकदमों के दायर होने की वर्तमान दर के मुताबिक 2040 में कुल 15 करोड़ मुकदमे लंबित होंगे, जिनके निस्तारण के लिए 75,000 न्यायाधीशों की जरूरत होगी। विभिन्न राज्य
सरकारों की मौजूदा कार्य पद्धति को देखते हुए यह संभव नहीं लगता।
अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन से इस चुनौती से निपटना आसान हो जाएगा, संविधान के अनुच्छेद 312 में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के बारे में कहा गया है कि इसके द्वारा चयनित व्यक्ति जिला न्यायाधीशों के समकक्ष होगा। यह पद जब केंद्रीय स्तर पर भरा जाएगा, तो केंद्र सरकार से जरूरी पदों के सृजन और उनकी चयन-प्रक्रिया को पूरा करने के लिए दबाव बनाना आसान होगा। जिस तरह से अन्य भारतीय सेवाओं के लिए आबादी के अनुपात में पदों का सृजन होता है, उसी तरह यहां पर भी यह काम आसान हो जाएगा और आबादी तथा मुकदमों के अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या हो जाने से मुकदमों का बोझ कम होगा।
इस समय न्यायपालिका में चयन के लिए दो पद्धतियां हैं। जिला अदालतों के लिए लिखित परीक्षा तथा साक्षात्कार के माध्यम से चयन होता है। उच्च न्यायालयों के 25 प्रतिशत पद इन न्यायिक अधिकारियों की प्रोन्नति से, जबकि शेष पद अधिवक्तागण में से कॉलेजियम द्वारा भरे जाते हैं। जिला अदालतों के लिए लिखित परीक्षा के माध्यम से न्यायिक सेवा में आने वाले न्यायाधीशों के उच्च न्यायालय तक पहुंचने की संभावना बहुत कम होती है। सुप्रीम कोर्ट तक उनके पहुंचने की तो कल्पना करना भी कठिन है। इन परिस्थितियों में उनके मन में वंचना-बोध पैदा होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि प्रतिभाशाली छात्रों का रुझान इस सेवा की ओर कम होता जा रहा है। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के बाद उच्च न्यायालय और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के लिए प्रतिभावान न्यायाधीशों का ऐसा विकल्प उपलब्ध होगा, जो इस संस्था की प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयां दे सकता है।