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मुद्दा: यह असंवेदनशीलता नई नहीं... पुलिस के दमन से हताशा, जागृति के साथ सड़कों पर आक्रोशित जनता

बिमल राय
Updated Tue, 03 Sep 2024 04:11 AM IST

सार

बंगाल में पिछले दिनों जो दृश्य दिखे, वे बहुत दिनों से सुलग रहे क्षोभ के ज्वालामुखी बनने की कहानी है।
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आरजी कर अस्पताल की वारदात के बाद भड़का जनाक्रोश, कोलकाता पुलिस ने की कार्रवाई (फाइल) - फोटो : एएनआई


पुलिस को दमन की मशीनरी बनाने और भ्रष्टाचार व गुंडागर्दी को प्रतिष्ठानिक रूप देने के चलते आम जनता हताश है। आरजी कर अस्पताल की डॉक्टर से दुष्कर्म व हत्याकांड ने आक्रोश को ज्वालामुखी बना दिया है। छात्र समाज के नवान्न चलो अभियान को सत्ताधारियों ने भले ही 19 जगहों पर किलानुमा दीवारें खड़ी कर विफल कर दिया हो, पर 28 अगस्त को बुलाए गए बंगाल बंद को विफल करने के लिए उतरी पुलिस को कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। ‘आत्महत्या’ (जैसा कि फोन कर अस्पताल ने बताया) करने वाली अपनी इकलौती बेटी का शव देखने के लिए मां-बाप को अगर तीन घंटे का इंतजार कराया गया, तो शक क्यों नहीं पैदा होगा?


सवाल है कि जिस नवान्न अभियान को रोकने के लिए अगर 19 जगहों पर लोहे की दीवारें खड़ी की गई थीं, तो 14 अगस्त की रात पुलिस कहां थी? जब उपद्रवियों ने अस्पताल की करोड़ों की संपत्ति तोड़ दी? संदेशखाली कांड में शेख शाहजहां को पकड़ने में 50 दिन लगाने वाली पुलिस की मौजूदा सक्रियता सवालों के घेरे में है? सवाल है कि आरजी कर मामले में मुख्यमंत्री ममता ने खुद के शासन के खिलाफ पदयात्रा का प्रहसन क्यों किया?


उन्होंने इस मामले में प्रधानमंत्री को पत्र लिख मारा, जिसका जवाब आया कि पश्चिम बंगाल को दुष्कर्म और बाल यौन अपराध के मामलों की सुनवाई के लिए 123 फास्ट-ट्रैक अदालतें आवंटित की गई हैं, लेकिन उनमें से कई अदालतें आज भी काम नहीं कर रही हैं। 28 अगस्त को तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस के भाषण में ममता ने न आंदोलनों को बंगाल की बदनामी से जोड़ दिया और दुष्कर्म के खिलाफ कड़ा कानून बनाने की मांग पर पूरे राज्य में ब्लाॅक स्तर पर धरना देने का कार्यक्रम घोषित किया।सीबीआई से सवाल पूछे और आरजी कर अस्पताल के हड़ताली डॉक्टरों को दबे स्वर में धमकाया।

विरोध में सड़क पर उतरे लोगों को ‘बाहरी’ बताया। विधानसभा में भी दुष्कर्मियों को 10 दिन के अंदर फांसी देने का कानून बनाने की बात कही, जो राज्य सरकारों के दायित्व में आता

ही नहीं है। लोगों को झांसा देने वाले सरकार के इन नए-नए कदमों पर एक शेर मौजूं है- मरीज-ए-इश्क पर रहमत खुदा की, मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।


बंगाल में पिछले दिनों जो दृश्य दिखे, वे बहुत दिनों से सुलग रहे क्षोभ के ज्वालामुखी बनने की कहानी है। 2011 में वाममोर्चा को हराकर सत्ता हासिल करने वाली ममता बनर्जी ने कुछ ही महीनों बाद भवानीपुर थाना पहुंचकर अपने दो दंगाई कार्यकर्ताओं को जबरन छुड़ा लिया। 2012 में कोलकाता के पार्क स्ट्रीट में एक एंग्लो इंडियन महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म को ‘सजाई गई घटना’ बताकर, 12 अप्रैल 2022 को नादिया जिले के हांसखाली में एक किशोरी से दुष्कर्म व हत्या पर उसके गर्भवती होने या यह प्रेम प्रसंग का बयान देकर ममता ने अपनी असंवेदनशीलता ही जाहिर की है।
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इसी वर्ष, कूचबिहार में भाजपा अल्पसंख्यक महिला मोर्चा की नेता को निर्वस्त्र कर पीटने को पुलिस ने पारिवारिक कलह बताया। उत्तर दिनाजपुर के चोपड़ा में एक कंगारू अदालत ने एक महिला को विवाहेत्तर संबंधों की सजा दी और जज के आसन पर बैठा था कुख्यात अपराधी ताजमुल उर्फ जेसीबी। कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि बंगाल शेख शाहजहां जैसे अत्याचारियों और पार्थ चटर्जी व ज्योतिप्रिय मल्लिक जैसे भ्रष्टाचारियों की करतूतों से पैदा हुए आक्रोश से सुलग रहा है। आज प्रेसिडेंसी जेल में पूर्व शिक्षामंत्री पार्थ चटर्जी का पड़ोसी आरजी कर अस्पताल कांड का आरोपी संजय रॉय ही है। ममता ने बंगाल में ‘बाहरी लोगों’ की लगाई आग से पड़ोस के कई राज्यों के चपेट में लेने की धमकी दी है, जिसे ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ का लक्षण नहीं तो और क्या कहा जाए? साथ ही राज्य की कानून-व्यवस्था से नाराज लोग एक नई तरह की जागृति के साथ सड़कों पर उतर रहे हैं।

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