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बंद हो यूपीएससी में छल-प्रपंच की नीति

Wed, 30 Jul 2014 12:56 AM IST
गोविन्द सिंह
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संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) भारतीय नौकरशाही का मेरुदंड है और उसके भीतर अंग्रेजियत के विषाणु जन्मजात रूप से जमे हैं। आज तो फिर भी बहुत कुछ बदल गया है, 1979 से पहले तो लगता नहीं था कि भारत आजाद भी हो गया है। तब भारतीय विदेश सेवा में चुनींदा स्कूल-कॉलेजों से निकले हुए, एक खास उच्चारण और चाल-ढाल वाले युवा ही लिए जाते थे। हमें निश्चय ही दौलत सिंह कोठारी जैसे विद्वानों का आभारी होना चाहिए, जिन्होंने भारतीय भाषाओं के लिए रास्ता बनाया। पर उसके बाद से यूपीएससी का रवैया भी काफी हद तक बदल चुका है। जैसे ही सरकार या निगरानी समूहों का ध्यान हटा, वह घुसपैठ करने लगती है।
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चूंकि यूपीएससी नौकरशाही के हाथों में खेलती है, इसलिए वह अंग्रेजियत को मजबूत करने का मौका नहीं छोड़ती। 1990 में सतीश चंद्र समिति तक भारतीय भाषाओं का वर्चस्व नहीं दिख रहा था। उसके बाद के दशक में भारतीय भाषाओं को माध्यम बनाकर सिविल सेवक बनने वालों की तादाद बढ़ने लगी। इससे अंग्रेजी परस्त लोग घबराने लगे। उन्होंने पोप तक को चिट्ठी लिखकर गुजारिश की थी कि वे भारत सरकार पर दबाव डालें कि ब्यूरोक्रेसी के चरित्र को बदलने न दें। सिविल सेवा में भारतीय भाषाओं से मतलब शहरों के दुर्ग को तोड़कर गांवों को प्रतिष्ठित करना था। इसीलिए 2010 में बनी निगवेकर समिति ने सिविल सेवा की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाओं को ही बदल डाला। जहां प्रारंभिक परीक्षा में सी-सैट के जरिये अंग्रेजी वालों को तरजीह दी गई, वहीं मुख्य परीक्षा में भी अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया गया।

तब से भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने और पास करने वालों की संख्या लगातार घटने लगी। इससे स्पष्ट हो गया कि नई व्यवस्था पूरी तरह देसी युवाओं को बाहर रखने के मकसद से बनाई गई है। पिछले वर्ष मुख्य परीक्षा से अंग्रेजी को खत्म करने के लिए आंदोलन हुआ। तभी भेदभावपूर्ण सी-सैट के खिलाफ आवाज उठी, तो अरविंद वर्मा समिति बैठा दी गई। समिति को शीघ्र अपनी रिपोर्ट देनी थी, लेकिन वह नहीं दे पाई। उसका कार्यकाल तीन महीने बढ़ा दिया गया, ताकि परीक्षा पूर्ववत जारी रखी जाए। उसकी प्रारंभिक रिपोर्ट में कहा गया था कि सी-सैट का पलड़ा अंग्रेजी के पक्ष में झुका है, जिससे भारतीय भाषाओं वाले युवाओं के प्रति पक्षपात हो रहा है। पर नौकरशाह इसे मानने को तैयार नहीं। उसी के विरोध में यह आंदोलन है।
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अजीब बात यह है कि आंदोलन के विरोध में कोई नहीं है। हर कोई कह रहा है कि भाषाई आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। पर नौकरशाही है कि मानती नहीं। अंग्रेजी मीडिया जरूर फूट डालने की कोशिश करता है। जबकि इससे जितना नुकसान हिंदी माध्यम वालों को है, उतना ही अन्य भाषा भाषियों को भी है। अभी तक हम मानते थे कि भाषा को लेकर राजनेता संसद और संसद से बाहर अलग-अलग व्यवहार करते हैं। इसलिए हिंदी कभी राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा नहीं बन पाई। पहली बार एक ऐसे प्रधानमंत्री आए हैं, जो हिंदी को लेकर स्पष्ट हैं। इसलिए अब भाषा को लेकर छल-प्रपंच की नीति बंद होनी चाहिए।
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