पश्चिम बंगाल में एक के बाद एक कंपनी जिस तरह अपना कामकाज बंद कर रही है, उससे ममता बनर्जी सरकार की उद्योग नीति पर सवाल उठ रहे हैं। यह इस राज्य की विडंबना है कि वाम मोर्चे के उद्योग-विरोधी माहौल के बाद जो सरकार आई है, वह भी पिछली सरकार के तौर-तरीके का ही अनुसरण कर रही है।
हावड़ा स्थित शालीमार पेंट्स लिमिटेड में सोलह जुलाई को अनिश्चित काल के लिए काम बंद हो गया, जिससे करीब 350 कर्मचारी बेकार हो गए। इसके पहले उत्तरपाड़ा में देश के पहले और एकमात्र एकीकृत ऑटोमोबाइल संयंत्र हिंद मोटर में काम बंद हुआ था, जिससे करीब 2,500 कर्मचारी बेरोजगार हो गए थे।
हल्दिया बंदरगाह में फ्रांस की एलडीए तथा भारत की एबीजी संस्था ने मिलकर हल्दिया बल्क टर्मिनल्स (एचबीटी) नामक एजेंसी बनाई थी। इसका काम हल्दिया बंदरगाह में माल की ढुलाई व रखरखाव करना था। नवंबर, 2012 में उसने काम बंद कर दिया, जिससे 626 कर्मचारी बेरोजगार हो गए। डनलप कारखाना तीन साल से बंद चल रहा है।
पश्चिम बंगाल में नई सरकार बनने के बाद यानी पिछले तीन वर्ष में 51 कारखाने, 22 जूट मिलें और 22 चाय बागान बंद हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक लाख 33 हजार कर्मचारी बेरोजगार हो गए। ज्यादा चिंतित करने वाली बात यह है कि पश्चिम बंगाल में अपने कल-कारखाने बंद करने वाले कई उद्योगपति दूसरे राज्य में नए उद्योग लगा रहे हैं।
राज्य में अभी तक निवेश के जितने प्रस्ताव आए हैं, वे दूसरे राज्यों की तुलना में बहुत कम हैं। ममता बनर्जी का एफडीआई और विशेष आर्थिक जोन का विरोधी होना जहां निवेश में अवरोध पैदा करता है, वहीं राज्य सरकार की जमीन अधिग्रहण नीति भी इसमें रोड़ा बनी हुई है।
ममता बनर्जी ने तीन साल पहले राज्य की सत्ता संभालने के बाद ऐलान किया था कि उद्योगों के लिए उनकी सरकार खुद जमीन नहीं उपलब्ध कराएगी, उद्योगपतियों को जमीन मालिकों से सीधे जमीन खरीदनी होगी। सिंगुर और नंदीग्राम की हिंसा को देखते हुए दीदी का यह रुख सही हो सकता है।
यह भी ठीक है कि खेती की कीमत पर उद्योग नहीं पनपने चाहिए। लेकिन मौजूदा दौर में उद्योगपतियों को हतोत्साहित करने की नीति को सही नहीं कह सकते।
ममता बनर्जी की सरकार को ऐसा परिवेश उपलब्ध कराना चाहिए कि उद्योगपति अपने कारखाने बंद करने की सोचें ही नहीं। जो कल-कारखाने बंद हुए, उन्हें पुनः खुलवाने के लिए भी सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए। तृणमूल सरकार को ऐसी नई उद्योग नीति की भी घोषणा करनी होगी, जो उद्योगपतियों को शत-प्रतिशत आश्वस्त कर सके।
उद्योगपति जब आश्वस्त होंगे, तभी नए निवेश का वातावरण बन सकेगा और निवेशकों को आकृष्ट किया जा सकेगा। दुर्भाग्य तो यह है कि अमित मित्र जैसी शख्सियत को राज्य में ले आने का भी औद्योगिक परिदृश्य पर अब तक कोई लाभ नहीं पहुंचा है।
पश्चिम बंगाल की कार्यसंस्कृति ऐसी है कि जो लोग सत्ता में आते हैं, उसी के पाले हुए असामाजिक तत्व उद्योग-धंधों को बाधित करने के काम में लग जाते हैं। हल्दिया से एचबीटी की विदाई के पीछे कानून-व्यवस्था की बदहाली को बड़ा कारण बताया गया। सारदा घोटाला जैसे मामले भी राज्य में उद्योगों को हतोत्साहित करने की बड़ी वजह हैं।
कभी पश्चिम बंगाल उत्तर प्रदेश और बिहार के हिंदी भाषी लोगों की एक बड़ी आबादी के रोजगार का बड़ा केंद्र था। पर धीरे-धीरे उस माहौल को खत्म कर दिया गया है। इसका अधिक नुकसान पश्चिम बंगाल को ही है।