कुछ वर्ष पूर्व आईआईसी (दिल्ली) में एक व्याख्यान के दौरान इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने दावा किया था कि राष्ट्रीय नेता अपनी मौत के बाद जनता के मानस से क्रमशः विस्मृत होने लगते हैं, वहीं आंबेडकर का आभामंडल उनकी मौत के बाद उनके जीवनकाल से दस गुना अधिक बड़ा हो गया है! इससे ऐसा लगा था मानो कई श्रोता गुस्से से उबल पड़े हों; उन्हें लगा कि गुहा ने अनजाने में गांधी और नेहरू का तिरस्कार कर दिया है।
लेकिन पूरे देश में उनकी प्रतिमाएं जिस तरह से स्थापित हुई हैं और देश के कोने-कोने में लाखों लोग अपने घरों में किसी देवता की तरह उनकी तस्वीरें लगाते हैं, उसे देखकर कहा जा सकता है कि गुहा ने ठीक कहा था। आंबेडकर, जिन्होंने गांधी को महात्मा कहने से इन्कार कर दिया था और समाज सुधारक के रूप में उनकी साख पर कठोरता से सवाल करते हुए उनकी आलोचना की थी और जिन्हें बेमन से पूना समझौते पर हस्ताक्षर करने पड़े थे, उन्होंने लगता है कि अहम चुनावों से पहले राष्ट्रपिता को अपदस्थ कर दिया है। जमीनी हकीकत बताती है कि उनका नाम भुनाना कितना फायदेमंद है। आज कितने राजनीतिक दल और राजनेता महात्मा गांधी के नाम पर वोट मांगते हैं? उनकी समाधि दो अक्तूबर को गुलाब की पंखुड़ियां चढ़ाने और उनके कुछ मनपसंदीदा भजन गायन की मूक गवाह बन गई है, जहां विपक्षी नेता यदा-कदा प्रदर्शन करते हैं और अब तो देश के प्रधानमंत्री भी वहां इस रूप में नजर आते हैं। हताश महात्मा ने इस स्थिति पर शायद बुदबुदाया हो, 'हे राम'! लेकिन उनकी मद्धिम आवाज भीड़ के शोर में कहीं खो गई है।
आंबेडकर जहां कहीं भी होंगे, वह यह देखकर खुश हो रहे होंगे कि उन्हें अपना बताने के लिए किस तरह होड़ मच गई है। जिनके पूर्वज उनके साथ बैठने को तैयार नहीं थे, जीते-जीते जिन्होंने उन्हें उनका स्थान नहीं दिया, उनकी फाइलें फेंक दी और यह सुनिश्चित किया कि आजाद भारत की पहली सरकार से इस्तीफा देने के बाद वह कोई चुनाव न जीत पाएं, वे आज ऊंची इमारतों की छतों पर खड़े होकर और सोशल मीडिया में शोर मचा रहे हैं कि वे उनके कितने प्रशंसक हैं, उनके नाम की कितनी योजनाएं शुरू की गई हैं और किस तरह से उन्होंने उनके बताए रास्ते पर देश को आगे बढ़ाया!
इस वर्ष 14 अप्रैल को उनके 127वें जन्मदिन पर उनका स्मरण करते हुए मुख्यमंत्रियों ने तमाम अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन दिया, मानो वे एक दूसरे को इस मामले में पछाड़ना चाहते हों। जोर-शोर से दावे-प्रतिदावे किए जा रहे हैं कि किस पार्टी ने उन्हें सर्वाधिक सम्मान दिया। कुछ राष्ट्रीय नेता जो कभी हरिजन बस्तियों में नहीं गए, अब टीवी कैमरों के साथ वहां जा रहे हैं और दलितों के साथ भोजन कर रहे हैं। 14 अप्रैल के आसपास पहले कभी संसद मार्ग पर आंबेडकर के इतने बैनर, पोस्टर नजर नहीं आए। आंबेडकर इससे अधिक और क्या कह सकते हैं? उनका आगमन हो चुका है! उन्हें तो खुश होना चाहिए!
लेकिन क्या आंबेडकर, जोकि अपने समय में विधि के तीव्र जानकार थे, इस अवसरवादी, औपचारिक और प्रतीकात्मक प्रदर्शन से खुश होंगे? उन्नाव अब भी हो रहा है। लोगों की भारी नाराजगी और मीडिया तथा सोशल मीडिया में आवाजें उठने के बाद ही आरोपी विधायक की गिरफ्तारी हो सकी। ऊना की क्रूर और घिनौनी घटना ने हॉलीवुड की फिल्म 12 इयर्स ए स्लेव की याद दिला दी कि ऐसी घटनाएं आज भी होती हैं। अस्पृश्यता को कानूनी तौर पर दशकों पहले खत्म कर दिया गया था, लेकिन हजारों गांवों में यह आज भी व्याप्त है। अनेक राज्यों में आज भी दलित दुल्हे घोड़ियों या हाथी पर बैठकर अपनी बारात नहीं निकाल सकते। कई जगहों पर तो वे अपनी मूंछंे भी नहीं उगा सकते। 2014 में बदायूं में दो नाबालिग दलित लड़कियों के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उन्हें मार दिया गया था और उनके शव पेड़ों पर लटका दिए गए थे। निर्भया मामले के बाद प्रधान न्यायाधीश को कहना पड़ा था कि रोजाना दर्जनों दलित लड़कियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं होती हैं, लेकिन कोई संगठन उनके लिए मोमबत्ती नहीं जलाता!
विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में दलित छात्रों के साथ भेदभाव कोई कोरी कल्पना नहीं है, बल्कि हकीकत है। हाल ही में लोकसभा में गृह राज्य मंत्री ने बताया था कि एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के मुताबिक 2016 में अनुसुचित जाति और जनजातियों के लोगों के उत्पीड़न के 47,338 मामले दर्ज किए गए थे। चूंकि ग्रामीण क्षेत्रों में चार में मुश्किल से एक मामला ही थाने तक पहुंचता है, इसलिए ऐसे मामलों की संख्या चार गुना अधिक हो सकती है। यह अफसोस है कि सिर्फ 25 से 27 फीसदी मामलों में ही सजा हो पाती है।
आखिर आज भी छुआछुत दंडमुक्ति के साथ कायम है? इसलिए क्योंकि व्यवस्था राजनीतिक, आर्थिक और बाहुबल के कारण ऐसे अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती कि कहीं इसका चुनाव पर नकारात्मक असर न पड़ जाए। और सिविल सर्वेंट्स जिनसे उम्मीद की जाती है कि वे संविधान की गरिमा को ऊंचा उठाएंगे, अपनी नाक के नीचे ऐसे अपराधों को होने देते हैं।
इस बीच, पुराने दलित नेताओं का भविष्य और राजनीतिक दलों का मॉडल खतरे में है। दलित नेताओं की अगली पीढ़ी कहीं अधिक आक्रामक, आत्मविश्वास से लैस, तकनीक का इस्तेमाल करने वाली और मुखर है, जो उन्हें अप्रासंगिक कर देगी। आंबेडकर द्वारा दिए गए अधिकारों के प्रति वह सचेत है और कांशीराम तथा मायावती की शिक्षा से अधिकारों को लेकर जागरूक है। दलितों द्वारा बुलाया गया भारत बंद सफल था, मगर उसमें हिंसा हुई, जिसकी जांच होनी चाहिए ताकि उसके कारण का पता लग सके। आंबेडकर के जन्मदिन का बेहतर उपयोग दलित बच्चों के लिए स्कूल खोलकर किया जा सकता था। इससे आंबेडकर सचमुच खुश होते, क्योंकि सशक्तिकरण के लिए वह शिक्षा को पहला कदम मानते थे।