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सुप्रीम सुधार का समय: पिछले दो दशकों में इस भूमिका, कामकाज और प्रक्रियाओं में भारी बदलाव

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 30 Aug 2020 12:55 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : पीटीआई

भारत के सुप्रीम कोर्ट पर नजदीक से नजर रखने वाले पर्यवेक्षक इस बात से सहमत होंगे कि पिछले दो दशकों में इस कोर्ट की भूमिका, कामकाज और प्रक्रियाओं में भारी बदलाव आया है। इनमें से कुछ रेखांकित किए जाने वाले बदलाव निम्न हैं :


 

  • जजों को मामले वितरित किए जाने की व्यवस्था, खासतौर से पीठ की अगुआई करने वाले जज;
  • पीठों का गठन;
  • कोर्ट के न्यायाधिकार क्षेत्र का विस्तार;
  • कुछ निश्चित फैसलों की विधिशास्त्र संबंधी बुनियाद; और
  • कार्यपालिका के अधिकारों का क्षरण।


पुरानी चिंताएं कायम हैं

कई विद्वानों ने न्यायिक सुधारों के बारे में लिखा है। अनेक सुधारों को केंद्र और राज्य सरकारों ने आगे बढ़ाया है- मसलन, विशेष अदालतों का गठन, और अधिक जजों की नियुक्तियां इत्यादि; संसद ने और अधिक विधेयक पारित किए हैं और खुद सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटाइजेशन, मामलों के प्रबंधन और अब वर्चुअल कोर्ट लगाने जैसे कदम उठाए हैं। फिर भी, परेशान करने वाले तथ्य पहले जैसे कायम हैं, हर स्तर पर भारी संख्या में लंबित मामले; बड़ी संख्या में जजों के पदों पर रिक्तियां; और न्याय की गुणवत्ता को लेकर वादियों में आम तौर पर व्याप्त हताशा। 


एक नई चिंता फिर से उभर रही है और वह न्यायपालिका की 'स्वतंत्रता' से संबंधित है। अधीनस्थ न्यायपालिका, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर चिंता के कारण भिन्न हैं।


मैं अपना ध्यान अभी सुप्रीम कोर्ट पर केंद्रित कर रहा हूं। जहां तक मौलिक अधिकारों की बात है- और अब तेजी से बढ़ते मानवाधिकार, पशुओं और पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी से संबंधित अधिकारों के मामलों में भी- सुप्रीम कोर्ट हमेशा प्रहरी की भूमिका में चौकस होता है। यह भूमिका तभी निभाई जा सकती है, जब तक कि कोर्ट पूरी तरह से स्वतंत्र हो और मेरा मानना है कि यह स्वतंत्रता तभी कायम रखी जा सकती है, जब कुछ बड़े सुधारों को अपनाया जाए। ये हैं कुछ वांछित सुधार :


अपेक्षितः सांविधानिक अदालत

1. सुप्रीम कोर्ट का दर्जा ऊंचा कर उसे एक सांविधानिक अदालत बनाया जाए। यह केवल भारत के संविधान की व्याख्या से संबंधित प्रश्नों से जुड़े मामलों में सुनवाई करे और फैसला सुनाए और दुर्लभ अवसरों पर, ऐसे मामलों में, जिनमें महान सार्वजनिक महत्व और परिणामों के कानूनी मुद्दे शामिल हैं। मेरा सुझाव है कि सुप्रीम कोर्ट के सात जज एक कोर्ट के रूप में न कि पीठों के रूप में बैठें।


एक प्रश्न तुरंत उठता है कि हाई कोर्ट के फैसलों पर की जाने वाली अपीलों को कौन सुनेगा? अपीलीय क्षेत्राधिकार वास्तव में एक महत्वपूर्ण कार्य है, विशेष रूप से एक संघीय प्रणाली में, और उच्च न्यायालय परस्पर विरोधी निर्णय दे सकते हैं। इसका जवाब है अपीलीय कोर्ट का गठनः पांच अपीलीय कोर्ट बनाए जाएं, जिनमें से प्रत्येक कोर्ट में छह जज हों, जो दो पीठों में तीन-तीन जजों में बंटे हों और इस तरह कुल 30 जज होंगे। यह उस देश के लिए बड़ी संख्या नहीं है, जिसकी आबादी 161 करोड़ के आंकड़े तक पहुंच सकती है।
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इस तरह 37 जजों के साथ-सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा स्वीकृत संख्या 34 है-सर्वोच्च अदालत में सुधार किया जा सकता है, ताकि वह अपीलीय अदालत और सांविधानिक अदालत, दोनों ही भूमिकाओं में काम कर सके।


2. पीठों को मामले 'आवंटित' करने की व्यवस्था को खत्म करने की जरूरत है। नई व्यवस्था में कोई पीठ नहीं होगी और मास्टर ऑफ रोस्टर (मामलों की सुनवाई के लिए बेंच गठित करने का प्रधान न्यायाधीश का विशेषाधिकार) की जरूरत नहीं होगी। (आलोचक कहते हैं कि मास्टर ऑफ द रोस्टर की व्यवस्था रोस्टर ऑफ द मास्टर में बदल गई है) जस्टिस केएन सिंह ने प्रधान न्यायाधीश के रूप में अपने 18 दिन के संक्षिप्त कार्यकाल में कई मामले अपनी पीठ को आवंटित किए और फैसले सुनाए; उनकी सेवानिवृत्ति के बाद उनके अनेक फैसलों की समीक्षा की गई और उन्हें पलट दिया गया।


आखिर कोई इसे कैसे समझे कि जस्टिस दीपक मिश्रा ने अपने खुद के खिलाफ आरोप से संबंधित एक मामले में एक अन्य पीठ के न्यायिक आदेश को निष्प्रभावी करते हुए खुद की अगुआई में पांच जजों की पीठ के गठन का आदेश जारी किया और फिर यह मामला तीन जजों की पीठ को सौंप दिया? और कोई यह कैसे अनदेखा कर सकता है कि जस्टिस रंजन गोगोई ने अपनी पीठ को (जिसमें दो अन्य जज भी शामिल थे) एक ऐसा मामला सौंपा, जिसमें उनके खुद के खिलाफ आरोप थे और फिर इस पीठ ने सुनवाई की और फैसला दिया, जिस पर सिर्फ उन दो जजों के हस्ताक्षर थे? बेशक ये कुछ उदाहरण हैं, लेकिन हमें सर्वोच्च अदालत की पीठों को मामले आवंटित करने वाली व्यवस्था को खत्म करना चाहिए।


अन्य सुधार


3. चूंकि पीठें मामलों की सुनवाई करती हैं, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून अनिश्चित हैं। प्रत्येक उच्चतम न्यायालय ने अपने पहले के फैसलों को उलट दिया है, लेकिन आमतौर पर इस तरह के उलटफेर युगांतरकारी बदलाव या जनता के व्यापक विरोध के कारण होते हैं। हालांकि भारत में फैसले इसलिए बदल दिए गए, क्योंकि दो या तीन जजों की पीठ ने सांविधानिक पीठों के बाध्यकारी फैसलों को मानने से इन्कार कर दिया; या फिर तीन जजों की किसी पीठ ने पहले के दृष्टिकोण से अलग दृष्टिकोण रखा। इसका एक उदाहरण भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 की धारा 24 से संबंधित मामले से जुड़ा है। अनेक वकील कानूनी अनिश्चितता को लेकर दुखी हैं। कानून की व्याख्या और प्रतिव्याख्या के कारण नागरिकों के मन में भी अपने व्यक्तिगत और कारोबारी मामलों को लेकर अनिश्चितता है।


4. कार्यपालिका को अपने विधि अधिकारियों के जरिये सर्वोच्च न्यायालय में तब आवाज उठानी चाहिए, जब वह पूरी तरह से प्रशासनिक या नीतिगत निर्णय की न्यायिक समीक्षा करना चाहे, वह भी बिना क्षेत्राधिकार के। यदि कार्यपालिका का कोई नीतिगत या प्रशासनिक फैसला गलत है, तो उसे दुरुस्त करने की जगह संसद/ विधानसभा या फिर मतदान केंद्र है।


5. सेवानिवृत्ति के बाद सर्वोच्च अदालत के जजों को कार्यपालिका के जरिये 'पुरस्कार' देने की संभावना को पूरी तरह से खत्म करना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक जज को सेवानिवृत्ति के बाद आजीवन उनका पूरा वेतन और भत्ता दिया जाना चाहिए और वह कोई जिम्मेदारी या सांविधानिक पद स्वीकार न करें। इसकी जो छोटी-सी वित्तीय लागत होगी, उसे देश सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए खुशी से सहन कर लेगा।


आप भी और सुधारों के बारे में सोचिए, क्योंकि हम सबको एक स्वतंत्र सुप्रीम कोर्ट की जरूरत है।

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