उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह की जलकर मौत, जनवरी, 2014 में सुनंदा पुष्कर की दिल्ली के सात सितारा होटल में मृत्यु एवं अगस्त, 2011 में भोपाल में आरटीआई कार्यकर्ता शहला मसूद की गोली मारकर हत्या। इन तीनों हत्याओं में एक बात समान है। इन तीनों में प्रथम दृष्टया शक नेताओं पर जाता है, और नेता भी सत्ताधारी दलों के। इसलिए संबंधित राज्यों की पुलिस ने उसी हिसाब से मुकदमों में सुस्ती दिखाई।
शहला मसूद ने मध्य प्रदेश में सत्ताधारी दल के विधायक ध्रुव नारायण सिंह की कुछ अनैतिक गतिविधियों को मीडिया में लाने का प्रयास किया था। नतीजतन उन्हें सरेआम गोली मार दी गई। पूरे सात महीने तक पुलिस को इस मामले में कोई सुराग नहीं मिला। जब मीडिया की सक्रियता से मामला सीबीआई को सौंपा गया, तब जाकर इस मामले का सच सामने आया। सुनंदा पुष्कर के मामले में पहले दिन से ही लग रहा था कि उनकी हत्या हुई है। परंतु दिल्ली पुलिस ने पूरे एक साल बाद उनकी हत्या की बात जनवरी, 2015 में मानी तथा प्राथमिकी दर्ज की। सुनंदा पुष्कर की हत्या के समय केंद्र में चूंकि यूपीए की सरकार थी, और उनके पति शशि थरूर कांग्रेस के कद्दावर नेता, इसलिए शक उन पर भी था। लेकिन दिल्ली पुलिस ने मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया।
पत्रकार जगेंद्र सिंह की हत्या में परिजनों ने राज्य के एक बाहुबली मंत्री पर हत्या का आरोप लगाकर रिपोर्ट दर्ज करवाई, किंतु कुछ नहीं हुआ, क्योंकि मामला सत्ताधारी दल के मंत्री से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश सरकार की इस मामले में लीपापोती की कोशिशों से पत्रकार के परिवार को न्याय मिलने की आशा कम नजर आ रही है, क्योंकि पुलिस इसे आत्महत्या बता रही है। ठीक वैसे, जैसे सुनंदा पुष्कर मामले में कहा जा रहा था कि उन्होंने नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या की है।
इन तीनों घटनाओं से साफ है कि देश की पुलिस जनता को न्याय नहीं दे पा रही। राजनीतिक दबाव में पुलिस को सत्ताधारी दलों के लोगों द्वारा किए अपराधों में साक्ष्य नजर ही नहीं आते। कानून-व्यवस्था के मामलों में भी यदि सत्ताधारी दल के लोग शांति भंग करते है, तब पुलिस के ढीलेपन के कारण छोटे झगड़े बड़ी हिंसा का रूप धारण कर लेते हैं। पुलिस के काम करने का एक और तरीका दिल्ली में देखने में आया, जब फर्जी डिग्री मामले में आप के मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर को गिरफ्तार कर पुलिस ने उन्हें उत्तर प्रदेश और बिहार में साक्ष्यों के लिए साधारण कैदी की तरह घुमाया। पुलिस की यह तत्परता इसलिए देखी गई कि दिल्ली सरकार का वहां की पुलिस पर कोई नियंत्रण नहीं है।
आज देश में अव्यवस्था एवं असंतोष का सबसे बड़ा कारण पुलिस का भेदभावपूर्ण बर्ताव एवं चारों तरफ व्याप्त भ्रष्टाचार है। अभी तक 1861 का पुलिस ऐक्ट लागू है। इस कानून में सत्ताधारी सरकार के प्रति जितनी आस्था है, जनता के प्रति जवाबदारी को उतनी जगह नहीं दी गई है। पुलिस व्यवस्था को सुधारने के लिए 2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने समस्त राज्यों और केंद्र सरकार को 10 सूत्री पुलिस सुधार लागू करने के लिए आदेश दिए थे। पर अभी तक ज्यादातर राज्यों ने इस दिशा में पहल इसलिए नहीं की, क्योंकि इससे राज्य सरकारों का पुलिस पर से नियंत्रण समाप्त हो जाएगा।