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तीन गज़लें

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1
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उनकी यादों का जो पलकों पे बसेरा होगा
जगमगाते हुए दीपों में सवेरा होगा।

प्यार की बीन पे नाच उठे जो नागिन की तरह
मीत उस गांव की गोरी का सपेरा होगा।

ऐ-गजल जिसने हसीं नक्श उभारे तेरे
माहिरे - फन वो अजन्ता का चितेरा होगा।

काफिले को था यकीं जिसकी निगाहेबानी पर
क्या खबर थी वो निगहेबां ही लुटेरा होगा।

जिनके जेहनों में न दर है, न दरीचा कोई
उनके आगे तो अंधेरा ही अंधेरा होगा।

कब किसी का ये जहां हो के रहा है ‘शेरी’,
फिर तुझे कैसे यकीं है कि ये तेरा होगा।
-चांद शेरी

2
जग के सारे ऐश लिये
जोगी वाला वेश लिये।

बेच रहे हैं हम मरहम
मन में भारी ठेस लिये।

करते काली करतूतें-
बाबा उजले केश लिये।

हमने हुक्म चलाया पर-
गुरुओं के आदेश लिये।

सूरज कहकर बहलाते-
जुगनू के अवशेष लिये।

जूठे बेरों से शबरी-
तुमने अवध-नरेश लिये।।
-सलीम खां फरीद

3
जाने क्या हो गई आज की जिंदगी?
दौड़ती, भागती, हांफती जिंदगी।

ख्वाहिशों के बदन ढंक न पाई कभी,
कब मुझे है मिली नाप की जिंदगी?

जब भी छूने चला अक्स धुंधला गया,
जैसे हो झील में चांद सी जिंदगी।

आओ फुटपाथ पर आके देखो जरा,
किस तरह से है फूली-फली जिंदगी।

नाम लेते हैं वो राम का रात दिन,
चाहते पर नहीं राम सी जिंदगी।

खेल कहते थे हम, बाप होकर मगर,
हमने समझा है क्या बाप की जिंदगी।

आके 'आलोक' देखो कभी गांव में,
झूठे वादों पे दम तोड़ती जिंदगी।
-आलोक यादव
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