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हजार वर्षों की अटूट परंपरा

तरुण विजय Published by: Raman Singh Updated Wed, 05 Feb 2020 06:17 PM IST
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तरुण विजय - फोटो : a

दक्षिण भारत के प्रसिद्ध तंजावुर बृहदेश्वर मंदिर में बुधवार को शिव पूजन तथा ऐतिहासिक कुंभाभिषेक हुआ, जिसमें दस लाख श्रद्धालु और हजारों विदेशी पर्यटक शामिल हुए। इस अवसर पर परिवहन समेत, सीसीटीवी और चिकित्सा सुविधाओं आदि की व्यापक स्तर पर व्यवस्था की गई थी। लेकिन दिल्ली की कलुषित राजनीति के कुहासे में यह अचर्चित ही रह गया। तंजावुर करीब एक हजार वर्ष पूर्व चोल वंश के राजाओं की राजधानी थी।



श्रीलंका विजय के बाद राजाराज चोल प्रथम ने भगवान शिव का यह विराट मंदिर बनवाया था, जो अपने आप में एक आश्चर्य ही है। करीब एक हजार वर्ष से लगातार इसके कुंभाभिषेक होते हैं, जिसमें मंदिर के गोपुरम पर स्थापित कलश को देश की सभी पवित्र नदियों के जल से स्नान काराया जाता है एवं आभूषणों से देव प्रतिमा का अलंकरण कर दिव्य शक्ति का आवाहन करते हुए गर्भगृह और मंदिर परिसर को ईश्वरी शक्ति से प्राणवान किया जाता है। विद्वानों के अनुसार, पिछले करीब एक हजार साल में इस मंदिर में पांच या सात बार ही कुंभाभिषेक हुए हैं।


चीन और भारत को विश्व की विद्यमान दो सबसे प्राचीन सभ्यताएं कहा जाता है, लेकिन चीन में भी माओ त्से तुंग की रक्तरंजित क्रांति के कारण सभ्यता के प्राचीन सूत्रों का संपर्क टूट गया, और अब वहां सभ्यता के नाम पर जो कुछ भी है, वह संग्रहालयों और स्मारकों में ही दिखता है, समाज-जीवन में नहीं। केवल भारत में ही उन परंपराओं, धार्मिक रीतियों और सामाजिक उत्सवों के दर्शन होते हैं, जो हजार, दो हजार साल या उससे भी पहले देश में प्रचलित थे।


तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर को दक्षिण मेरू भी कहा जाता है। पूर्वी एशिया तक हिंदू साम्राज्य स्थापित करने वाले राज राज चोल प्रथम ने 1003 से 1010 ईस्वी के बीच इस मंदिर का निर्माण किया था। शैव, वैष्णव तथा शाक्त परंपराओं का समन्वय दर्शाने वाले इस विराट मंदिर को देखने में पूरा दिन लग जाता है। इस मंदिर की ऊंचाई 216 फीट है और शिखर पर 80 टन की एक विराट शिला शोभायमान है। दुनिया भर के इंजीनियर आकर इसका अध्ययन करते हैं कि एक हजार साल पहले 216 फीट ऊंचे गोपुरम पर उस विराट शिला को कैसे स्थापित किया गया होगा, और इस्पात तथा सीमेंट के बगैर किस तकनीक से यह मंदिर जस का तस गौरवोन्नत खड़ा है। मंदिर के गर्भगृह के समक्ष प्रांगण में नंदी की एक विशाल मूर्ति है, जिसका वजन 25 टन है। एक ही चट्टान में गढ़कर बनाया गया यह भारत में अपनी किस्म का अकेला नंदी शिल्प है। चोल के बाद पांड्य, नायक और विजयनगर साम्राज्य के अलावा इस क्षेत्र में मराठा राजाओं और पेशवाओं ने अधिकार जमाया और इन सब का प्रभाव इस मंदिर पर पड़ा।


यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में होने के बावजूद पिछले कुछ वर्षों में इस मंदिर की व्यवस्था और इसके आसपास के अतिक्रमण के बारे में अनेक विडंबनापूर्ण शिकायतें मिलती रही हैं। और तमिलनाडु के मंदिरों में हर साल करोड़ों श्रद्धालुओं को आमंत्रित किए जाने के बावजूद वहां धर्मनिरपेक्षता का यह आलम है कि हिंदू मंदिरों की व्यवस्था बेहतर करने में भी शासन को संकोच होता है तथा उसे डर लगता है कि यदि देश के इन महानतम मंदिरों में विशेष सुविधाएं दी गईं, तो शायद उन्हें हिंदूवादी कहा जाए। उत्तर भारत में हमारी दक्षिणात्य विरासत के प्रति शिक्षा संस्थानों में शायद ही कुछ बताया जाता हो। लेकिन इतना तो तय है कि इस विरासत के बिना भारत की परिभाषा पूरी नहीं हो सकती।

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