विगत अनेक वर्षों से शहीद भगत सिंह को याद करने का सिलसिला तेजी से चल पड़ा है। सारे राजनीतिक और सांस्कृतिक संगठन उनकी तस्वीर पर फूल-मालाएं चढ़ा रहे हैं। यहां तक कि कुछ समय पूर्व हिंदी सिनेमा ने भी इस क्रांतिकारी शहीद की छवि को बेचने के लिए एक साथ पांच-पांच फिल्में बना डालीं। दक्षिणपंथियों से लेकर मध्यमार्गी और वामपक्ष के भीतर भी भगत सिंह को लेकर अनेक तरह की हलचलें दिखाई पड़ जाती रहीं।
इस शहीद का जन्म शताब्दी वर्ष आते-आते तो उनके सिर पर लगा हैट उतारकर बाकायदा पगड़ी पहना दी गई। यह सब एक सोची-समझी साजिश के तौर पर हुआ। एक ओर जहां भगत सिंह को विचार की दुनिया से पूरी तरह काटकर उन्हें 'वंदेमातरम', 'भारतमाता की जय’ और 'इन्कलाब जिंदाबाद’ का उद्घोष कर ’मेरा रंग दे वसंती चोला’ गाते हुए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल जाने वाले राष्ट्रवादी नौजवान के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा, दूसरी ओर उनके हाथ में अपने-अपने दलों के झंडे थमाने में भी कोई हिचक नहीं दिखाई गई।
उत्तर भारत में विश्व हिंदू परिषद हिंदू हितचिंतक अभियान चलाती रही है, जो अपने प्रचार में जिन पोस्टरों-चित्रों का इस्तेमाल करती है, उनमें भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उग्र हिंदुत्व के नायक रहे, विनायक दामोदर सावरकर के साथ दिखाती है। जाहिर है कि सावरकर के संग अन्य क्रांतिकारियों को रखे जाने का उद्देश्य यही है कि उन क्रांतिकारियों की विचार चेतना पर पर्दा डाल दिया जाए। इतिहास का कौन जानकार यह कह सकता है कि सावरकर को छोड़कर किस क्रांतिकारी ने हिंदू राष्ट्र की कल्पना के संबंध में अपने विचार प्रकट किए। क्या यह शहीद भगत सिंह और उनके साथियों की क्रांतिकारी प्रगतिशील विचारधारा से छेड़छाड़ नहीं है। भगत सिंह जैसे मार्क्सवादी चेतना से संपन्न क्रांतिदृष्टा को विहिप के पोस्टर/वैनर पर रखे जाने के पीछे आखिर कौन-सा तर्क है? कौन नहीं जानता कि भगत सिंह 'मैं नास्तिक क्यों हूं’, जैसे पर्चे को लिखने वाले खालिस धर्मनिरपेक्ष थे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने तो 'स्वतंत्रता संग्राम और वामपंथ’ तथा 'फारवर्ड ब्लॉक ही क्यों’ जैसे आलेखों के जरिये अपने पक्ष और मंतव्यों को स्पष्ट करने की सार्थक कोशिशें कीं।
अपने राजनीतिक हित को साधने के लिए भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल और सुभाष चंद्र बोस जैसे राष्ट्र नायकों की छवि का इस्तेमाल किसी भी संगठन को नहीं करना चाहिए। भगत सिंह के साथ दूसरा बड़ा खतरा उस क्रांतिकारी चिंतक को प्रदर्शन की वस्तु और बिकाऊ माल में तब्दील कर देना है। यह कम खेदजनक नहीं है कि इस नासमझी के लिए वामपंथी कहे जाने वाले संगठन और लेखक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। कुछ निहित स्वार्थों के चलते लोगों ने भगत सिंह की स्मृति को बहुत निर्लज्ज तरीके से सत्ता का मोहताज भी बना दिया है।
भगत सिंह की धर्मनिरपेक्षता अथवा उनकी नास्तिक विचारधारा पर प्रहार करते समय उनके 'मैं नास्तिक क्यों हूं’ निबंध को नजरंदाज करने का कोई अर्थ नहीं है। कुछ लोग जो इस क्रांतिकारी की छवि को देवत्व सौंप रहे हैं, वे भी उस इतिहास और परंपरा का कम नुकसान नहीं कर रहे हैं।
लेखक क्रांतिकारी आंदोलन के सजग अध्येता व विश्लेषक हैं।