गांधार में एक विराट यज्ञ का आयोजन हो रहा था। आचार्य हरिद्रुमत उसका संचालन कराने के लिए जा रहे थे। मार्ग में उन्हें एक ऐसा गांव मिला, जहां के बारे में प्रचलित था कि उस गांव में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जो ईश्वर को न मानता हो। वहां के सभी लोग धर्म में आस्था रखते थे।
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किंतु यह क्या, जब वह एक गली से गुजर रहे थे, तब वहां एक गृहस्थ अपने बच्चे को बुरी तरह पीट रहा था। बच्चे से कोई गलती हो गई थी, जिस कारण गृहस्थ उस पर गुस्से से लाल हो रहा था। हरिद्रुमत के पूछने पर उस गृहस्थ ने रुक-रुककर बताया, महाराज! नाराज न होऊं, तो क्या करूं? सारे गांव में यही ऐसा है, जो नास्तिक है। इससे मुझे समाज में अपयश मिल रहा है। आप ही बताइए, क्या किया जाए?
आचार्य ने पूछा, तुम्हें क्यों लगता है कि यह बालक नास्तिक है? उस व्यक्ति ने कहा, यह अपने से बड़ों का सम्मान नहीं करता। परिवार में सब मानते हैं कि ईश्वर सबका पिता है, लेकिन इसके लिए दुनिया की सभी चीजें, प्राणी और मनुष्य गौण हैं। यह किसी की नहीं सुनता।
हरिद्रमुत ने बच्चे की भी दिक्कतें सुनीं, और उसके बाद गृहस्थ से सिर्फ इतना कहा, इसे कुछ दिन आश्रम में रहने दो। वहां से लौट आने पर देखना इसे। गृहस्थ की अनुमति पर हरिद्रुमत उसे आश्रम ले गए। रात में उन्होंने बालक को बारह घंटे खुले आकाश तले लेटने और तारों को निहारते रहने के लिए कहा। बालक चालीस दिनों तक ऐसा ही करता रहा। आखिरी दिनों में उसे लगने लगा कि वाकई दुनिया बहुत बड़ी है और अकल्पनीय भी। बालक को गृहस्थ के हाथों में सौंपते हुए हरिद्रुमत ने कहा, आप इस बालक के साथ अपेक्षाकृत और घनिष्ठ प्रेम कीजिए। इतना कहकर वह आगे बढ़ गए।