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पुत्र रत्न सर्वश्रेष्ठ रत्न

Mon, 04 May 2015 07:46 PM IST
वीना सिंह
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एक पुत्र की आस तो सभी को होती है। भले ही वह कुपुत्र क्यों न हो, पर पुत्र अवश्य हो। इसीलिए मेरे पड़ोस वाली काकी की नाराजगी जायज है। वह बाबा रामदेव से खासी नाराज हैं, जो यह दिव्य पुत्रजीवक बीज वह इतनी देर से लाए। यदि उनके समय में यह दवा बन गई होती और इसका प्रचार हो गया होता, तो वह सात-सात बेटियों का बोझ उठाने से बच जातीं। एक पुत्र रत्न की चाह में सात कन्याएं उनके घर में विराजमान हो गईं। पूरी उम्र भरण-पोषण और ब्याह करने में निकल गई और बेटे की चाह दिल में ज्यों की त्यों रह गई।
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अभी तक तो वह अपने भाग्य को कोस रही थीं। पर अब वह सीधे-सीधे रामदेव पर निशाना साध रही हैं। सारा कुसूर बाबा जी की लेट लतीफी का है, जो वह बेटे के सुख से वंचित रह गई। वैसे उन्हें यह सोचकर संतोष करना चाहिए कि आगे की पीढ़ियों के लिए सरलता हो गई। अब महिलाएं पुत्रवती नहीं होने पर मारी नहीं जाएंगी, छोड़ी नहीं जाएंगी, प्रताड़ित नहीं की जाएंगी। अनगिनत पुत्र रत्न की इच्छा रखने वाले दंपति ढोंगी बाबाओं के जाल में फंसने से बच जाएंगे। पुत्र प्राप्ति के बाद बेटी भी शायद मां के गर्भ में सांस ले सके। देखा जाए, तो यह समाज सेवा का सबसे बड़ा कार्य है। हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्या का समाधान है।

वैसे पुत्र को महत्व मिलना कोई नई बात नहीं है। हर युग में पुत्र का महत्व माता-पिता के सिर चढ़कर बोला है। यदि ऐसा न होता, तो राजा दशरथ ने एक पुत्री की भी इच्छा व्यक्त की होती। राजा धृतराष्ट्र पुत्र प्रेम में न पगलाते, तो महाभारत जैसा युद्ध नहीं होता। ग्रंथों में जगह-जगह राजा-महाराजाओं के सैकड़ों की संख्या में पुत्रों का वर्णन मिलता है। साधु-संत भी हमेशा 'पुत्रवती भव' का आशीर्वाद देते रहे हैं, पुत्रीवती भव का नहीं। ऐसे में बाबा रामदेव ने दिव्य पुत्रजीवक बीज बना ही डाला, तो हल्ला मचाने का क्या मतलब। यह तो प्रसन्नता का विषय है कि उनकी अथक खोज के कारण अब हर घर पुत्ररत्न से सुसज्जित हो सकेगा।
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