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पिता को इस तरह दी थी श्रद्धांजलि

असीम छाबड़ा
Updated Thu, 30 Apr 2020 07:42 AM IST
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इरफान खान - फोटो : ट्विटर

जब इरफान खान के दोस्त तिग्मांशु धूलिया बैंडिट क्वीन में शेखर कपूर की मदद कर रहे थे, तब उन्होंने आनंदबाजार ग्रुप की साप्ताहिक पत्रिका संडे में डाकू से राजनेता बनी फूलन देवी की कवर स्टोरी पढ़ी थी। उस स्टोरी में एक और डाकू पान सिंह तोमर के बारे में बताया गया था। पान सिंह तोमर सेना में थे और स्टीपलचेस रेस स्पर्धा में सात बार राष्ट्रीय चैंपियन रहे इस सैनिक ने एशियाई खेलों में देश का प्रतिनिधित्व किया था। लेकिन एक पारिवारिक जमीन विवाद ने उन्हें हथियार उठाने के लिए मजबूर कर दिया, और बाद में वह चंबल घाटी के एक खूंखार डाकू के रूप में जाने गए।



तिग्मांशु ने तभी ठान लिया था कि जब कभी वह निर्देशक बनेंगे, तब इस पर फिल्म जरूर बनाएंगे। उसी वक्त उन्होंने इरफान खान को पान सिंह तोमर की भूमिका देने का वादा भी किया था। वर्षों बाद रुड़की में पान सिंह तोमर की शूटिंग के दौरान इरफान ने टाइम मैग्जीन को बताया था, 'एक भुला दिए गए नायक की याद दिलाने के लिए मैं यह फिल्म कर रहा हूं।' इरफान ने पान सिंह तोमर के किरदार में अपने पिता को आदर्श बनाया। उन्होंने अनुपम खेर को बताया था, 'कुछ किरदार ऐसे होते हैं, जिनके आदर्श हमें अपने आसपास से उठाने पड़ते हैं।


पान सिंह तोमर के किरदार के लिए मुझे ऐसा कोई आदर्श नहीं मिला। लेकिन मेरे पास अपने पिता की कुछ स्मृतियां थीं, जिनसे मुझे काफी मदद मिली। दूसरे शब्दों में कहें, तो पान सिंह तोमर के जरिये मैंने अपने पिता को श्रद्धांजलि दी है।' जब यह फिल्म रिलीज हुई, तब इरफान पैंतालीस साल के थे। दौड़ और स्टीपलचेस स्पर्धाओं के दृश्यों में तिग्मांशु ने बॉडी डबल की पेशकश की थी, लेकिन इरफान ने खेलों की सारी शूटिंग खुद की।


वर्ष 2015 तक इरफान खान के अभिनय ने भारतीय फिल्मोद्योग में अपनी खास पहचान बना ली थी। इरफान खान ने न केवल हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और यहां तक कि हॉलीवुड में खुद को स्थापित कर लिया था, बल्कि यहां तक पहुंचते हुए उन्होंने पहले ही पर्याप्त जोखिम भी उठाया था। अब उनके सामने खुद को एक नए क्षेत्र में यानी रोमांटिक लीड में अभिनय करने की चुनौती थी। हालांकि नेमसेक से लेकर लाइफ इन ए... मेट्रो और पान सिंह तोमर में वह अपनी रोमांटिक क्षमता का परिचय दे चुके थे।


लेकिन अब वह रोमांटिक कॉमेडी में काम करने के लिए तैयार थे। लेकिन वह अगले शाहरुख खान नहीं बनने जा रहे थे। उनके अभिनय में अमोल पालेकर और फारूक शेख का कमोबेश असर हो सकता था, लेकिन आखिरकार इसमें इरफान खान के अपने मौलिक अभिनय की छाप ही होनी थी। इरफान को शूजित सरकार ने अपनी मौलिक कॉमेडी ड्रामा फिल्म पीकू में दक्षिण दिल्ली के एक कैब कंपनी मालिक राना का किरदार दिया। इरफान पहली बार हिंदी फिल्मों की नंबर वन अभिनेत्री दीपिका पादुकोण और अभिताभ बच्चन के साथ काम करने जा रहे थे, जो पीकू के पिता भास्कर बनर्जी की भूमिका में थे। पिकु में काम करने के लिए उन्होंने रिड्ले स्कॉट की फिल्म द मार्टियन छोड़ दी।


उन्हें इस बात की खुशी ज्यादा थी कि वह दीपिका और अमिताभ के साथ काम करने जा रहे थे। उन्हें इसका भी अफसोस नहीं था कि फिल्म में उनकी फीस इन दोनों से कम होगी। हालांकि शूजित सरकार ने जब इरफान को साइन किया, तब उसकी स्क्रिप्ट पर काम चल ही रहा था। इसके बावजूद इरफान ने हामी भर दी। शूजित ने महसूस किया कि इरफान अपनी पीढ़ी के संभवतः एकमात्र अभिनेता हैं, जो स्क्रिप्ट में ज्यादा कुछ न होने के बावजूद अपनी भूमिका बेहतरीन ढंग से निभा सकते हैं।


राना की स्क्रिप्ट में ज्यादा कुछ नहीं था। लेकिन इरफान ने अपने अभिनय से राना के किरदार को जीवंत कर दिया। राना के व्यक्तित्व की खासियतें और अपने काम और घर से मिलने वाला तनाव इस किरदार को एक आम किरदार बनाता था। रोजमर्रा का जीवन आदमी को वह काम भी करने को विवश कर देता है, जो वह करना नहीं चाहता। और यही एक बात राना को हालिया दौर का सबसे सुखद किरदार बनाती है। पीकू में काम करते हुए शूजित सरकार को इरफान की एक और दुर्लभ खासियत का पता चला। यह खासियत थी-अपने किरदार के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल करना।
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-इरफान खान, द मैन, द ड्रीमर, द स्टार के संपादित अंश।

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