सावधान, सावधान, सावधान! नक्कालों से बचें। लौटाने का शोर मचाने वालों के धोखे में हर्गिज न आएं। हम केसरिया ब्रांड घर-वापसी वालों का लौटना-लौटाना ही असली है। लेखक लोग लौटाने का शोर मचाकर जो कुछ लौटाना चाहते हैं, वह तो महज तुच्छ पुरस्कार वापसी है। उनका लौटाना राजनीतिक है, उसे घर वापसी जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक माल से कोई कन्फ्यूज न करे।
लेखकों के नकली लौटाने की पहचान जरा भी मुश्किल नहीं है। असल में इनका लौटाना पूरा लौटाना ही नहीं है। किसी ने सिर्फ चेक लौटाया है, तो किसी ने सार्टिफिकेट। कई तो लौटाने के नाम पर जुबानी जमा-खर्च पर ही अटके हुए हैं। पूरा पुरस्कार ज्यादातर ने नहीं लौटाया है। यह लौटाना भी कोई लौटाना है, लल्लू!
जब लौटाना ही नकली है, तो लौटाने की वजह कैसे असली हो सकती है? कहां के कलबुर्गी, कहां के मारने वाले और कहां के लौटाने वाले, कहीं कोई तो संबंध हो! और चलो कलबुर्गी तो फिर भी लेखक थे, उनकी देश-दुनिया में पहचान थी, मगर बीच में इकलाख कहां से आ गया? कम से कम बहाना तो ढंग का होता। और कुछ नहीं मिला, तो भाई लोग हाथ धोकर बेचारे संस्कृति मंत्री की सफाई करने के एलान के पीछे पड़ गए हैं। क्यों भाई, साहित्य-संस्कृति वगैरह की सफाई भी तो जरूरी है। बाहर-बाहर की सफाई से ही भारत स्वच्छ कैसे हो जाएगा? भीतर के मेल-मिलावट की सफाई भी तो जरूरी है। सिर्फ स्वच्छ होना काफी नहीं है; स्वच्छ भारत का शुद्ध भारत होना भी जरूरी है।
फिर इस पुरस्कार वापसी में घर वापसी जैसी स्वच्छता कहां? यह निष्ठा का नहीं, मजबूरी का मामला है : रपट पड़े, तो हर गंगे। उधर संस्कृति मंत्री ने झाडू उठाने का एलान किया और इधर धड़ाधड़ नकली लेखकों के तमगे गिरने लगे। झाडू चलेगी, तब तो डलावघर में कलमों के अंबार लग जाएंगे। जेटली जी ने एकदम सही कहा, लेखकों का लौटाना हर तरह से नकली है। लेखकों की घर निकासी को, घर वापसी से कोई न मिलाए।