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ये जगह धड़कती है

Sat, 15 Mar 2014 10:48 PM IST
संदीप शर्मा
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कुल सवा सौ गजलों में उर्दू जुबां के इस नए शायर ने अपना दिल खोलकर रख दिया है। ‘ये जगह धड़कती है’ को पढ़ने के बाद कहा जा सकता है कि ओम प्रभाकर अपने शब्दों को सही तरीके से इस्तेमाल करना बखूबी जानते हैं। इस संग्रह में शब्दों की सादा-सी लकीरों से गजल का एक ऐसा चित्र तैयार किया गया है, जो बेजान कागज को असरदार बनाने के लिए काफी है।
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आजकल अधिकतर नए शायर कायनात, खुदा, वफा, प्रेम, सौंदर्य और रूहानियत जैसे विषयों पर अपनी कलम चलाते हैं, लेकिन प्रभाकर लीक से हटकर चलते नजर आए हैं। अपने पहले ही गजल संग्रह में उन्होंने कई अहसासों को गजल के माध्यम से जुबां देने की कोशिश की है।

मसलन यहां रूमानियत तो है ही- 'सभी सुनते हैं घर में सिर्फ अपनी-अपनी दिलचस्पी, धसकते बामो-दर की सिसकियां बीमार सुनते हैं।'  और इनके बीच एक जज्बात है, जो गजल को जिंदा रखने के लिए ही बना है- 'जहां के लोग खुदा के करम पे जिंदा हैं, इलाका वो भी हमारे नगर का हिस्सा है।' गजल के शौकीनों को यह संग्रह बिल्कुल भी निराश नहीं करेगा।
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