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हार से खत्म नहीं हुई है बसपा

Sun, 01 Jun 2014 07:20 PM IST
अजय बोस
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बदायूं में दो दलित लड़कियों के साथ बलात्कार और फिर हुई हत्या ने हताश बहुजन समाज पार्टी को उठ खड़े होने का एक मौका दिया है। उत्तर प्रदेश की सपा सरकार पर निशाना साधकर मायावती नए संकल्पों का आभास दे रही हैं। हालांकि सच तो यह है कि अपने अस्तित्व के बाद से बसपा अब तक के सबसे बड़े संकट में है। चुनावी लड़ाइयों का खासा अनुभव हासिल कर चुकी मायावती के लिए 2014 की हार अप्रत्याशित है। इस बार लोकसभा में बसपा का एक भी सांसद नहीं पहुंच पाया है। इससे पहले कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन बेहद खराब रहा, जबकि दो साल पहले वह उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर हुई है। ऐसे में, उस पार्टी के भविष्य पर गहरा संदेह पैदा होता है, जिससे कुछ वर्ष पहले तक भी भारतीय राजनीति को बदलने की उम्मीद की जा रही थी।
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लेकिन मायावती भी कम नहीं हैं। हार न मानने वाले अपने अंदाज में उन्होंने इस पराजय के लिए उस चुनावी व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया है, जिसमें सबसे अधिक वोट मिलने वाले प्रत्याशी का ही महत्व होता है। उत्तर प्रदेश में करीब बीस प्रतिशत वोट पाने के बावजूद बसपा एक भी सीट नहीं जीत पाई है। अपने स्तब्ध दलित कैडरों को मायावती ने समझाया है कि राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 34 पर बसपा दूसरे स्थान पर रही है, और अब भी भाजपा और कांग्रेस के बाद वह तीसरी बड़ी पार्टी है, इसलिए निराश होने की वजह नहीं है।

मायावती ऊपरी तौर पर चाहे जितनी भी बहादुरी दिखाएं, पर उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे हिस्सों में बसपा जिस तेजी से अपना वर्चस्व खोती जा रही है, वह पार्टी सुप्रीमो के लिए चिंताजनक है। बसपा की यह स्थिति कोई अचानक नहीं हुई है। पिछले लोकसभा चुनाव में भी ज्यादा सीटें जीतकर केंद्र में सरकार गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की अपनी योजना में वह विफल रही थी। उसके बाद से ही उसकी स्थिति बदतर होती जा रही है। पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उसकी सत्ता गई, फिर राज्य के बाहर उसकी कमतर मौजूदगी और घट गई, और अब लोकसभा चुनाव में उसका पूरी तरह सफाया हो गया है।
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हाल के वर्षों में बसपा का वोट प्रतिशत जिस तेजी से गिरा है, वह ध्यान देने लायक है। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में 30.43 फीसदी वोट के साथ बसपा उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई थी, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट प्रतिशत गिरकर 27.42 रह गया। 2012 में राज्य की सत्ता से वह बाहर हुई, तो उसका वोट प्रतिशत और गिरकर 25.91 रह गया, जो इस बार के लोकसभा चुनाव में और कम होकर 19.6 फीसदी रह गया। यानी सात साल के दौरान उसके वोट प्रतिशत में करीब 11 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। बसपा जैसी पार्टी के वोट प्रतिशत में दोहरे अंक की यह गिरावट चुनावी जीत के मामले में बहुत घातक है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में पार्टी का दलित जनाधार बिखरा हुआ है, और मौजूदा चुनावी व्यवस्था में पार्टी को जीत के लिए लोकसभा की हर सीट पर दूसरे सामाजिक समूहों के समर्थन की जरूरत पड़ती है। ऐसे में, यह आश्चर्यजनक नहीं है कि उत्तर प्रदेश में बसपा को मोदी लहर का भीषण खामियाजा भुगतना पड़ा है।

विद्रूप देखिए कि चुनाव से पहले भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह को, जो उत्तर प्रदेश में 50 से 60 सीटें जीतने की कोशिश में थे, सबसे ज्यादा डर मायावती से ही था, क्योंकि कई समुदायों को साथ जोड़कर भाजपा को चुनौती देने के काबिल वही थीं। बसपा का ही यह डर था कि शाह ने न सिर्फ यह सुनिश्चित किया कि बसपा को अपने कैडर से बाहर के वोट न मिलें, बल्कि निचली जातियों और दलितों को लुभाने में भी उन्होंने कसर नहीं छोड़ी।

दलितों के एक हिस्से को मायावती से दूर करने की भाजपाई रणनीति दो उद्देश्यों से चालित थी। एक तो इससे दलितों और मुस्लिमों के बीच का पुराना तनाव उभर आने का उसे उस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लाभ मिला, जहां थोड़े समय पहले दंगे भड़के थे। दूसरे, ऐसा कहा जाता है कि अमित शाह ने मायावती के वोट बैंक को भरोसा दिलाया कि लोकसभा चुनाव में वे मोदी के पक्ष में वोट करें, तो उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में बहनजी को सत्ता में लाने में भाजपा मदद करेगी। भाजपा की यह दोहरी रणनीति दूसरी पार्टियों पर भारी पड़ गई। इससे बसपा को वोट देने का मन बना चुके मुस्लिमों का एक हिस्सा भी उससे छिटक गया, क्योंकि उसे जब मालूम पड़ा कि दलितों का एक समूह ही मायावती को वोट नहीं दे रहा, तो वह भला क्यों देता?

लेकिन इससे मायावती या बसपा के खत्म हो जाने का निष्कर्ष निकालना गलत होगा। तीन साल बाद जब मायावती उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी की लड़ाई शुरू करेंगी, तब तक मोदी लहर एक हद तक थम चुकी होगी। सत्ता-विरोधी लहर के कारण तब जहां सपा के लिए विधानसभा चुनाव कठिन होगा, वहीं भाजपा के पास भी मायावती का मुकाबला करने लायक स्थानीय नेता का अभाव होगा। अलबत्ता राजनीति में दमदार वापसी के लिए खुद मायावती को भी कुछ बदलाव लाने होंगे। सभी क्षेत्रीय और जिला स्तरीय समन्वयकों को हटाकर कमोबेश बदलाव वह हालांकि कर चुकी हैं। पर बहनजी के लिए जरूरी यह है कि वह दिल्ली और लखनऊ के अपने बंगले से बाहर निकलकर, सुरक्षा गार्डों का घेरा तोड़कर जमीनी कार्यकर्ताओं और आम लोगों से मिलें। खुद को सक्रिय करके ही वह अपनी राजनीतिक विरासत को वापस पा सकती हैं।
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(दलित राजनीति के विश्लेषक और बहनजी-ए पॉलिटिकल बायोग्राफी ऑफ मायावती के लेखक)
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