पौराणिक काल से ही होली हास्य और लास्य का त्योहार है। इस हास्य और लास्य की भी सीमाएं होती हैं। पर क्या इन सीमाओं का ध्यान पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में रखा जाता है? होली के कुछ दिनों पहले से इन इलाकों के चट्टी-चौराहे कानफाड़ू संगीत से रोजाना जो गूंजना शुरू होते हैं, वह बुढ़वा मंगल के बाद तक लगातार गूंजते रहते हैं। इसके बोल ऐसे हैं, जिन्हें सभ्य समाज शायद ही पचा पाए। पर बरसों से होलियाना मूड के नाम पर अश्लीलता का यह कार्य व्यापार जारी है।
महाभारत के पुरुष सूक्त के मुताबिक, फगुआ मन-मंदिर की सफाई का त्योहार है। शायद यही वजह है कि फाग के राग में हास्य और लास्य का विधान हुआ। पर बदलते दौर में समाज की सोच का वितान भी फैलता जाता है। होली के दिनों में बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश का समाज इस तथ्य को क्यों भूल जाता है? इन इलाकों के हर चट्टी-चौराहों पर अश्लील बोल वाले गीतों की भरमार क्यों हो जाती है? इक्कीसवीं सदी में जब पूरी दुनिया बदल रही है, तकनीक के साथ ही सांस्कृतिक और सामाजिक बदलाव के नए मानदंड स्वीकार किए जा रहे हैं, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड का समाज अब भी होलियाना मूड के नाम पर भोंडे और द्विअर्थी गीतों में ही अपने फाग के राग ढूंढने में मसरूफ है।
भोजपुरी समाज में गीत और गायन की उदात्त और समृद्ध परंपरा को भुला दिया गया है। वसंत के सांस्कृतिक महत्व को जताने वाले गीतों की यहां समृद्ध परंपरा रही है। तकनीक और संचार माध्यमों के विस्तार से पहले के दौर में इन्हें सामूहिक तौर पर गाने की परंपरा थी। देवस्थान से फाग के राग की शुरुआत की परंपरा रही है। इन गीतों में अवध के राजा राम और ब्रज के बांके कान्हा की होरी के उदात्त चित्रण मिलते रहे हैं। छन्नूलाल मिश्र सरीखे लोगों ने आज भी इस परंपरा को बचाकर रखा है। पर पिछले तीन-चार दशकों में भोजपुरी संगीत का मतलब अश्लीलता से ही लगाया जाने लगा। जिस भोजपुरी में फिल्म निर्माण की शुरुआत हे गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो से हुई, और जहां लागी नाही छूटे राम जैसी सार्थक फिल्म बनी, वहां धीरे-धीरे ऐसी फिल्में बनने लगीं, जिनमें भोजपुरी समाज का कोई अक्स ही नहीं था। अश्लीलता की तमाम सीमाएं इन फिल्मों में पार होने लगीं। नतीजतन गीत-संगीत के छिछोरे कार्यक्रमों की बाढ़ आ गई। होली पर तो इनका चरम ही दिखने लगा।
होली के दिनों में पिछले तीन-चार दशक से जारी अश्लीलता के राग ने बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के चट्टी-चौराहों को ज्यादा फूहड़ बना रखा है। संस्कृति के इस ओछे कारोबार पर रोक लगाने पर विचार करने का समय आ गया है। संस्कृति में फूहड़ता का विस्तार उसकी निरंतरता की राह में बाधा बन सकता है। संचार और तकनीकी क्रांति के दौर में दुनिया भर की लोक संस्कृतियां अब हर उस व्यक्ति के दायरे में है, जो तकनीक का इस्तेमाल करता है। जब उसे पता चलता है कि दुनिया की लोक संस्कृतियों के बरक्स अपनी संस्कृति की उदात्त और समृद्ध परंपरा रही है, तब उसे अपने फूहड़ कलाकारों पर कोफ्त ही होती है। घर से बाहर महिलाएं देहाती इलाकों में भी निकल रही हैं। पर बाहर निकलते ही उनका पाला जब फूहड़ संगीत से पड़ता है, तो उनके लिए स्थिति असहनीय हो जाती है। अब वक्त आ गया है कि इन इलाकों का समाज खुद सोचे कि उसे यह फूहड़ता चाहिए या लोक रंग की समृद्ध परंपरा।