पहले चरण के मतदान के बाद इस बार का लोकसभा चुनाव और भी ज्यादा दिलचस्प, आकर्षक और खुला खेल बन गया है। पारंपरिक नजरिये से देखें, तो नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा-राजग आज भी चुनावी दौड़ में सबसे आगे है, लेकिन चुनावों की जटिलता, मतदाताओं की अस्थिरता, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों में भाजपा में मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व का अभाव और मौजूदा सत्तारूढ़ गठबंधन के सांसदों के प्रति सत्ता-विरोधी रुझान ने 17वीं लोकसभा के चुनाव को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बना दिया है। चुनावी राजनीति में उत्तर प्रदेश की पकड़ लगातार बनी हुई है। अस्सी लोकसभा सीटों का नतीजा फैसला करेगा कि अगले पांच साल तक कौन दिल्ली की गद्दी पर शासन करेगा। पहली नजर में मोदी का करिश्मा बरकरार है और राष्ट्रवाद तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में भाजपा को बढ़त हासिल होनी चाहिए। योगी आदित्यनाथ की अपील और वक्तृत्व कौशल ने भी भाजपा को धार दी है।
लेकिन राजनीतिक परिदृश्य के दूसरी तरफ जातिगत समीकरण काम कर रहे हैं। कम से कम देवबंद की रैली से यह स्पष्ट था कि जाट, यादव, दलित और मुसलमान एक साथ हैं। यह सिर्फ भीड़ नहीं थी, बल्कि एक सभा थी, जिसमें अक्सर आपस में लड़ने वाली जातियां एक-दूसरे के साथ अपनी रोजी-रोटी के मामलों को प्रमुखता देने के लिए सामूहिक संकल्प ले रही थीं। अगर यह खुशमिजाजी वोट और सीटों में तब्दील होती है, तो उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए समस्या है। यदि यहां भाजपा को चालीस से ज्यादा सीटों का नुकसान होता है, तो पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और पूर्वोत्तर से उसकी भरपाई नहीं हो सकती।
कर्नाटक को छोड़कर दक्षिण भारत में भी मजबूत पैठ न होने के कारण भाजपा के लिए मुश्किल है। चेन्नई और तमिलनाडु के कुछ इलाकों के दौरे से इन पंक्तियों के लेखक को पता चला कि अन्नाद्रमुक और भाजपा के गठबंधन की तुलना में द्रमुक और कांग्रेस के गठबंधन के प्रति कहीं ज्यादा आकर्षण और स्वीकार्यता है। जयललिता और करुणानिधि जैसे करिश्माई नेताओं की गैर-मौजूदगी में एम के स्टालिन बड़े नेता बनकर उभरे हैं। यह एक ऐसा राज्य है, जहां मोदी की लोकप्रियता राहुल गांधी से कम है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ऐसे राज्य हैं, जहां मोदी की लोकप्रियता क्षेत्रीय नेताओं की तुलना में कम है।
23 मई का दिन हमें एक महत्वपूर्ण जवाब देगा। क्या मोदी में वह ताकत और करिश्मा है कि वह जातिगत समीकरणों, सत्ता विरोधी रुझानों और क्षेत्रीय नेताओं को मात दे सकें? अगर वह यह उपलब्धि हासिल कर लेते हैं, तो देश उन्हें जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी की लीग में शामिल करेगा, जबकि अटल बिहारी वाजपेयी से एक पायदान आगे का नेता मान लेगा।
अब कांग्रेस पर भी एक नजर डालने की जरूरत है। कांग्रेस संगठन के भीतर कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे हैं, जो बताते हैं कि 17वीं लोकसभा का स्वरूप चाहे जो भी हो, 23 मई के बाद देश की सबसे पुरानी पार्टी में बदलाव होंगे। राहुल ने सबके प्रति न्याय करते हुए पार्टी पदानुक्रम में सभी स्तरों पर जवाबदेही लागू की है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में राहुल ने पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को पुणे लोकसभा सीट की जिम्मेदारी सौंपी है, जबकि महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष राधाकृष्ण विखे पाटिल को औरंगाबाद का प्रभारी बनाया है और बाला साहेब थोराट को शिरडी लोकसभा सीट का। चव्हाण, पाटिल और थोराट को जिम्मेदारी सौंपने का मतलब यह सुनिश्चित करना है कि इन तीनों सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार बड़े अंतर से जीत हासिल कर सकें।
राहुल चुनावी मैदान में कई बड़े और शक्तिशाली लोगों को आगे बढ़ाने में सफल रहे हैं, जो सोनिया गांधी नहीं कर पाई थीं। भोपाल से दिग्विजय सिंह, शोलापुर से सुशील कुमार शिंंदे, अमरेली से परेश धनानी, फर्रुखाबाद से सलमान खुर्शीद, सासाराम से मीरा कुमार, चंडीगढ़ से पवन कुमार बंसल आदि इसके उदाहरण हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष इन वरिष्ठ नेताओं को निर्देश दे रहे हैं कि वे चुनाव में अपनी क्षमता साबित करें।
ऐेसे ही घोषणापत्र की तैयारी भी असाधारण रही, जिसके बारे में राहुल ने कहा कि कई गैर राजनीतिक व्यक्तियों से सलाह ली गई, जिनमें से कई अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। अतीत के विपरीत इसमें ताजगी है। 2019 के घोषणापत्र ने सबका ध्यान खींचा है और आलोचकों तक ने इसकी प्रशंसा की है।
अमेठी की कहानी जटिल है। जातिगत समीकरणों को देखते हुए राहुल को हराना आसान नहीं है, क्योंकि उन्हें सपा-बसपा गठबंधन का समर्थन मिल रहा है। बसपा-सपा के मतदाताओं को भाजपा में स्थानांतरित करना आसान नहीं है और न ही मतदाता स्वयं भाजपा की तरफ जाने वाले हैं, चाहे मतदाताओं के बीच राहुल की व्यक्तिगत मौजूदगी हो या नहीं। याद रखने वाली बात है कि 2014 की मोदी सुनामी में भी मतदाता भाजपा की तरफ नहीं गए।
टॉम वडक्कन को छोड़कर 2014 के विपरीत पार्टी के कोई महत्वपूर्ण नेता पार्टी छोड़कर नहीं गए हैं। कांग्रेस के भीतर के असंतोष से निपटने में राहुल अब तक दृढ़ रहे हैं। जितिन प्रसाद, प्रिया दत्त और मिलिंद देवड़ा जैसे उनके कुछ करीबी सहयोगी परेशान थे। राहुल ने तेजी से काम किया और महत्वपूर्ण चुनाव के दौरान उन्हें पार्टी बदलने या घर पर बैठने से रोका। दूसरे स्तर पर उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा, मनीष खंडूरी और अन्य भाजपा नेताओं को पार्टी में शामिल किया। अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर को टिकट देने से काफी दिलचस्पी पैदा हुई है, क्योंकि राजनीति में प्रवेश करने वाले फिल्म अभिनेता अक्सर संकेत करते हैं कि हवा किस तरफ बह रही है। शत्रुघ्न सिन्हा हवा का रुख भांपने में माहिर हैं और राजनेताओं के राजनेता हैं।
इस बार कांग्रेस को सफल बनाने के लिए तीन गांधी मैदान में हैं। अगर सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और राहुल गांधी कांग्रेस को सौ से ज्यादा सीटें नहीं दिला पाते, तो कांग्रेस और गांधियों के बीच का रिश्ता धीरे-धीरे टूटना शुरू हो जाएगा और इस बात की भारी संभावना है कि मोदी को पूर्ण बहुमत मिल जाए। ऐसी स्थिति में शीघ्र ही कांग्रेस के जनता दल की तरह बिखरने की आशंका है।