अफगान विवाद को खत्म करने के लिए की जा रही अनेक पहलों के बीच अफगानिस्तान पुनर्गठन के लिए अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जल्माय खलीलजाद के नेतृत्व में की जा रही पहल अहम है, क्योंकि इसने तालिबान को सीधे हॉट लाइन के जरिये अमेरिका से संपर्क उपलब्ध कराया है। जबकि 2002 में ऐसे संपर्क से इनकार कर दिया गया था, जब तालिबान ने कहा था कि यदि अमेरिका अफगानिस्तान में बमबारी रोक दे, तो वह ओसामा बिन लादेन को सौंपने के बारे में बात कर सकता है। 17 वर्षों के बाद हालात खराब ही हुए हैं। अनुमान है कि अफगानिस्तान के 70 फीसदी हिस्से में तालिबान सक्रिय हैं। उन्होंने सिर्फ वादा किया है कि वह अमेरिकी फौज की वापसी के बाद अफगान जमीन पर अल कायदा और इस्लामिक स्टेट को पैर जमाने नहीं देगा। मौजूदा घटनाक्रम देखकर लगता नहीं कि अमेरिका जिस तेजी से अपनी फौज की वापसी चाहता है, वह अभी संभव है।
पहली बात, यह है कि वार्ताओं पर वार्ता। खालिजाद को यह बताने में चार महीने लग गए कि उनका शांति समझौता वापसी के समझौते जैसा नहीं है। यानी वार्ताओं का अंत नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने स्टेट ऑफ यूनियन भाषण में फौज में कटौती और आतंकवाद विरोधी अभियान में तेजी लाने की बात की थी। अफगानिस्तान में आतंकवाद विरोधी फौज का मतलब ही है वहां लंबे समय तक अमेरिका की मौजूदगी। इन वार्ताओं का दूसरा पहलू है अफगानिस्तान की सरकार के साथ विश्वासघात। अफगान सरकार की हैसियत क्रिकेट स्टेडियम में दर्शक जैसी हो गई है, जिसे कभी कभी तालियां पीटनी है। मॉस्को में अंतर अफगान वार्ता में उसकी गैर-मौजूगी से इसकी पुष्टि ही हुई है।
अफगान सरकार राष्ट्रवादी भंगिमाओं और विकल्प तलाशते हुए अपनी भूमिका तलाश रही है। उसके राजनीतिक विमर्श में आए बदलाव को भी देखा जा सकता है। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने अफगानिस्तान की ओर से वार्ता करने पर तालिबान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं और पूछा है कि यदि अफगान सरकार वैध नहीं है, तो फिर तालिबान ने किससे अपनी वैधता प्राप्त की है? वह सरकार के अपने अनुभव को बताने के लिए नजीबुल्ला सरकार से तुलना करते हैं कि कैसे उनसे शांति का वादा किया गया था, लेकिन इसके बजाय उन्हें लंबे संघर्ष में उलझा दिया गया था।
अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को न केवल सीमित करके देखा गया है, बल्कि उसके योगदान को खुद ट्रंप ने नजरंदाज किया है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान में दक्षिण एशिया से भारत सबसे बड़ा दानदाता है और उसने वहां तीन अरब डॉलर का निवेश किया है। विकास संबंधी उसकी मदद के बावजूद अफगानिस्तान में क्षेत्रीय सहमति उसके बिना बनाई जा रही है। खलीलजाद जनवरी में भारत गए थे, पर उससे कुछ ठोस नहीं निकला। उन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों को याद करते हुए ट्वीट किया था कि 'अफगानिस्तान में स्थायी शांति के लिए प्रतिबद्ध'। लेकिन हकीकत यह है कि फरवरी के अंत में वार्ता प्रक्रिया की बहाली में भारत को शामिल नहीं किया गया।
पाकिस्तान लगातार दावा करता है कि अफगानिस्तान में भारत की कोई भूमिका नहीं है और लगता है कि नाटो भी ऐसा सोचने लगा है। नाटो के राजनीतिक मामलों के सहायक महासचिव अल्जेंद्रो अलवार्गोन्जालेज ने कहा है कि अफगानिस्तान में भारत की प्रमुख भूमिका है, वैसे ही जैसे सैकड़ों अन्य की। इससे ऐसा लगता है कि जैसे उनकी मंशा है कि भारत को वहां सिर्फ वार्ता में शामिल नहीं किया जा सकता, क्योंकि वहां पाकिस्तान है। भारत की उपेक्षा अतीत की तरह अब भी हो रही है, पर वह अफगान सरकार के साथ है और चाहता है कि वहां शांति प्रक्रिया अफगान नेतृत्व और नियंत्रण में हो।
लेखिका नेशनल यूनिर्विसिटी सिंगापुर में शोधार्थी हैं।